किरन्तन - प्रकरण १७ | Kirantan prakaran 17
राग श्री
सखी री आतम रोग बुरो लग्यो, याको दारू ना मिले तबीब । चौदे भवन में न पाइए, सो हुआ हाथ हबीब ॥१॥
आतम रोग कासों कहिए, जिन पीठ दई परआतम । ए रोग क्यों ए ना मिटे, जो लों देखे ना मुख ब्रह्म ॥२॥
सो हबीब क्यों पाइए, कई कर कर थके उपाए । सास्त्र देखे सब सब्द, तिन दुख दिया बताए ॥३॥
सखी ताथें दुख प्यारो लग्यो, अंदर देखो विचार । सो दुख कैसे छोड़िए, जासों पाइए पिउ मनुहार ॥४॥
दुनी के सुख दिए मैं तिनको, जो कोई चाहे सुख । जिनसे मेरा पिउ मिले, मैं चाहूं सोई दुख ॥५॥
दुख प्यारो है मुझ को, जासों होए पिउ मिलन । कहा करूं मैं तिन सुख को, आखिर जित जलन ॥६॥
बड़ी मत के जो धनी कहे, होए गए जो आगे । तिन भी धनी मिलन को, दुख धनी पें माँगे ॥७॥
जब बिछोहा धनी का, तब दुख में धनी विलास । उन दुख के विलास में, पोहोंचाए देत धनी आस ॥८॥
कहा करूं तिन सुख को, जिन से होइए निरास । ए झूठा सुख है छल का, सो देत माया की फांस ॥९॥
दुख से पिउजी मिलसी, सुखें न मिलिया कोए । अपने धनी का मिलना, सो दुखै से होए ॥१०॥
दुख बड़ो पदारथ, जो कोई जाने ए । ताथें सुख को छोड़ के, दुख ले सके सो ले ॥११॥
रात दिन दुख लीजिए, खाते पीते दुख । उठते बैठते दुख चाहिए, यों पिउ सों होइए सनमुख ॥१२॥
इन दुख से कोई जिन डरो, इन दुख में पिउ को सुख । जो चाहत हैं सुख को, आखिर तिन में दुख ॥१३॥
दुख बिना न होवे जागनी, जो करे कोट उपाए । धनी जगाए जागहीं, ना तो दुख बिना क्यों ए न जगाए ॥१४॥
दुख खाना दुख पीवना, दुखै हमारो आहार । दुनियां को दुख खात है, तो दुख थें भागत संसार ॥१५॥
दुखतें विरहा उपजे, विरहे प्रेम इस्क । इस्क प्रेम जब आइया, तब नेहेचे मिलिए हक ॥१६॥
दुख सोभा दुख सिनगार, दुखै को सब साज । दुख ले जाए धनी पे, इन सुख तें होत अकाज ॥१७॥
तो दुख सारों ने मांगया, बड़ी मत वालों ने जाग । दुख तें अपने पिउ का, आवत विरह वैराग ॥१८॥
दुख बस्तर दुख भूखन, दुख थें निरमल देह । जो दुख प्यारो जीव को लगे, तो उपजे सत सनेह ॥१९॥
दुख दावानल काटत, और काटत सकल विकार । दुख काटत मूल माया को, बढ़े नहीं विस्तार ॥२०॥
दुख दसो द्वार भेदया, और दुख भेदयो रोम रोम । यों नख सिख दुख प्यारो लगे, तो कहा करे छल भोम ॥२१॥
सुख माया को मूल है, सो चाहे बढ़यो विस्तार । तिन साधो सुख तजिया, वास्ते अपने करतार ॥२२॥
बारीक बातें दुख की, जो कदी लगे मिठास । तो टूट जात है ए सुख, होत माया को नास ॥२३॥
ए दुख बातें सोई जानहीं, जाको आई वतन खुसबोए । ए दुख जानें अर्स अंकूरी, माया जीव न जाने कोए ॥२४॥
जो माया मोह थें उपजे, सो क्या जाने दुख के सुख । जो माया को सुख जानहीं, ताथें हुए बेमुख ॥२५॥
कुरान पुरान मैं देखिया, कही दुख की बड़ाई । साध बड़ों बड़ाई दुख की, लड़ाए लड़ाए के गाई ॥२६॥
मोल तोल ना दुख को, कोई नाहीं इन बराबर । जिन दुखथें धनी पाइए, ताको मोल होवे क्योंकर ॥२७॥
दुख तो मोहोंगे मोल को, मैं देख्या दिल ल्याए । दुनियां सब भागी फिरे, कोई न सके उचाए ॥२८॥
मैं तो चाह्या सुख को, पर धनी की मुझ पर मेहेर । ताथे दुख फेर फेर लिया, अब सुख लागत है जेहेर ॥२९॥
जो साहेब सनकूल होवहीं, तो दुख आवे तिन । इन दुनियां में चाह कर, दुख ना लिया किन ॥३०॥
दुख देवे दिवानगी, स्यानप देवे उड़ाए । ताथें दुख कोई ना लेवहीं, सब सुख स्यानप चाहें ॥३१॥
चाहन वाले दुख के, दुनियां में ढूंढ़ देख । ब्रह्मांड यार है सुख का, दुख दोस्त हुआ कोई एक ॥३२॥
जाको स्वाद लग्यो कछू दुख को, सो सुख कबूं न चाहे । वाको सो दुख फेर फेर, हिरदे चढ़ चढ़ आए ॥३३॥
महामत कहे इन दुख को, मोल ना कियो जाए । लाख बेर सिर दीजिए, तो भी सर भर न आवे ताए ॥३४॥
॥ प्रकरण ॥१७॥ चौपाई ॥२२०॥
