किरन्तन - प्रकरण १८ | Kirantan prakaran 18
राग श्री
मैं तो बिगड़या विश्व थें बिछुरया, बाबा मेरे ढिग आओ मत कोई । बेर बेर बरजत हों रे बाबा, न तो हम ज्यों बिगड़ेगा सोई ॥१॥
मैं लाज मत पत दई रे दुनी को, निलज होए भया न्यारा । जो राखे कुल वेद मरजादा, सो जिन संग करो हमारा ॥२॥
लोक सकल दौड़त दुनियां को, सो मैं जान के खोई । मैं डारया घर जारया हँसते, सो लोक राखत घर रोई ॥३॥
देत दिखाई सो मैं चाहत नाहीं, जा रंग राची लोकाई । मैं सब देखत हूं ए भरमना, सो इनों सत कर पाई ॥४॥
मैं कहूं दुनियां भई बावरी, ओ कहे बावरा मोही । अब एक मेरे कहे कौन पतीजे, ए बोहोत झूठे क्यों होई ॥५॥
चित में चेतन अंतरगत आपे, सकल में रह्या समाई । अलख को घर याको कोई न लखे, जो ए बोहोत करे चतुराई ॥६॥
सतगुर संगे मैं ए घर पाया, दिया पारब्रह्म देखाई । महामत कहे मैं या विध बिगड़या, तुम जिन बिगड़ो भाई ॥७॥
॥ प्रकरण ॥१८॥ चौपाई ॥२२७॥
