किरन्तन - प्रकरण १९
राग श्री
तुम समझ के संगत कीजो रे बाबा, मुझ जैसा दिवाना न कोई । जाही सों लोक लज्या पावे, सो तो मोहे बड़ाई ॥१॥
मैं तो बात करूं रे दिवानी, दुनियां तो स्यानी सुजान । स्याने दिवाने संग क्योंकर होवे, तुम मिलियो मोहे पेहेचान ॥२॥
मैं त्रिलोकी अगिन कर देखी, दुनियां को सो सुख । दुनियां को अमृत होए लागी, मोहे लागत है विख ॥३॥
जब मैं मरम पायो मोहजल को, तब मैं भाग्या रोई । डर के उबट चल्या उबाटे, बाट बड़ी मैं खोई ॥४॥
अहनिस डर आया मेरे अंग में, फिरया दिलडा भया दिवाना । भली बुरी कहे सो मैं कछू न देखूं, भागवे को मैं स्याना ॥५॥
मैं छोड़े कुटम सगे सब छोड़े, छोड़ी मत स्वांत सरम । लोक वेद मरजादा छोड़ी, भाग्या छोड़ सब धरम ॥६॥
ए सूरे पांऊं धरें क्यों पीछे, इनको तो लज्या लागे । देवें सीस सकल सुख खोवें, पर भाइयों को छोड़ न भागे ॥७॥
ए मिलके मरद चलें ज्यों महीपत, जांनो पड़ता अंबर पकड़सी । मोंहे अचंभा ए डरें नहीं किनसो, पर ए खेल केते दिन रेहसी ॥८॥
देखत काल पछाड़त पल में, तो भी आंख न खोलें । आप जैसा और कोई न देखें, मद छाके मुख बोलें ॥९॥
इनमें से नाठ्या मैं निसंक कायर होए, फेर न देख्या ब्रह्मांड । सुन्य निरंजन छोड़ मैं न्यारा, जाए पड़या पार अखण्ड ॥१०॥
अब तो कछुए न देखत मद में, पर ए मद है पल मात्र । महामत दिवाने को कह्यो न माने, सो पीछे करसी पछताप ॥११॥
॥ प्रकरण ॥१९॥ चौपाई ॥२३८॥
