किरन्तन - प्रकरण २
राग श्री मारू
बिंद में सिंध समाया रे साधो, बिंद में सिंध समाया । त्रिगुन सरूप खोजत भए विस्मय, पर अलख न जाए लखाया ॥१॥
वेद अगम केहे उलटे पीछे, नेत नेत कर गाया । खबर न परी बिंद उपज्या कहां थें, ताथें नाम निगम धराया ॥२॥
असत मंडल में सब कोई भूल्या, पर अखंड किने न बताया । नींद का खेल खेलत सब नींद में, जाग के किने न देखाया ॥३॥
सुपन की सृष्ट वैराट सुपन का, झूठे साँच ढँपाया । असत आपे सो क्यों सत को पेखे, इन पर पेड़ न पाया ॥४॥
खोजी खोजे बाहेर भीतर, ओ अंतर बैठा आप । सत सुपने को पारथीं पेखे, पर सुपना न देखे साख्यात ॥५॥
भरम की बाजी रची विस्तारी, भरमसों भरम भरमाना । साध सोई तुम खोजो रे साधो, जिनका पार पयाना ॥६॥
मृगजलसों जो त्रिखा भाजे, तो गुर बिना जीव पार पावे । अनेक उपाय करे जो कोई, तो बिंद का बिंद में समावे ॥७॥
देत देखाई बाहेर भीतर, ना भीतर बाहेर भी नाहीं । गुर प्रसादें अंतर पेख्या, सो सोभा बरनी न जाई ॥८॥
सतगुर सोई मिले जब सांचा, तब सिंध बिंद परचावे । प्रगट प्रकास करे पार ब्रह्म सों, तब बिंद अनेक उड़ावे ॥९॥
महामत कहे बिंद बैठे ही उड़या, पाया सागर सुख सिंध । अछरातीत अखण्ड घर पाया, ए निध पूरब सनमंध ॥१०॥
॥ प्रकरण ॥२॥ चौपाई ॥१५॥
