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विषय-सूची

किरन्तन - प्रकरण २०

राग श्री आसावरी

साधो या जुग की ए बुध । दुनियां मोह मद की छाकी, चली जात बेसुध ॥१॥

दुनी दुनी पें चाहे दुनियां, ताथें करामात ढूंढ़े । पीछे दोऊ बराबर संगी, तब दे सिच्छा और मूंडे ॥२॥

साधो केहेर कही करामात, ऐ दुनियां तित रांचे । झूठी दृष्ट जो बांधी झूठ सों, ताथें दिल ना लगत क्यों ए सांचे ॥३॥

कौन मैं कहां को कहां थें बिछुरयो, कौन भोम ए छल । गुर सिष्य ग्यान कथें पंथ पैंडे, पर एती न काहू अकल ॥४॥

या घर में या बन में रहे, पर कहा करे बिना सतगुर । तो लों मकसूद क्यों कर होवे, जो लों पाइए ना अखंड घर ॥५॥

सतगुर सोई जो वतन बतावे, मोह माया और आप । पार पुरूख जो परखावे, महामत तासों कीजे मिलाप ॥६॥

॥ प्रकरण ॥२०॥ चौपाई ॥२४४॥

इसी सन्दर्भ में देखें-