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किरन्तन - प्रकरण २१

राग श्री सारंग

चल्यो जुग जाए री सुध बिना । सुध बिना सुध बिना सुध बिना, चल्यो जुग जाए री सुध बिना ॥१॥

मूल प्रकृती मोह अहं थें, उपजे तीनों गुन । सो पांचों में पसरे, हुई अंधेरी चौदे भवन ॥२॥

प्रले प्रकृती जब भई, तब पांचों चौदे पतन । मोह अहं सबे उड़े, रहे सरगुन ना निरगुन ॥३॥

तब जीव को घर कहां रह्यो, कहां खसम वतन । गुर सिष्य नाम बोहोतों धरे, पर ए सुध परी न किन ॥४॥

ऊपर तले मांहें बाहेर, खोज्या कैयों जन । नेहेचल न्‍यारा सबन से, ए ठौर न पाई किन ॥५॥

निराकार कासों कहिए, कासों कहिए निरंजन । क्यों व्यापक क्यों होसी फना, एता न कह्या किन ॥६॥

क्यों सरूप है प्राकृत को, क्यों मोह क्यों सुंन । क्यों सरूप जो काल को, ए नेहेचे करी न किन ॥७॥

पंथ पैंडे सब चलहीं, कई दीन दरसन । ना सुध आप ना पार की, ए सुध परी न किन ॥८॥

कौन सरूप है आतमा, परआतम कह्या क्यों भिन । सुध ठौर ना सरूप की, ए संसे भान्यो न किन ॥९॥

महामत सो गुर पाइया, जो करसी साफ सबन । देसी सुख नेहेचल, ऐसी कबहूं ना करी किन ॥१०॥

॥ प्रकरण ॥२१॥ चौपाई ॥२५४॥

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