किरन्तन - प्रकरण २२
राग श्री
रे हो दुनियां बावरी, खोवत जनम गमार । मदमाती माया की छाकी, सुनत नाहीं पुकार ॥१॥
अपनी छायासों आप बिगूती, बल खोए चली हार । आग बिना जलत अंग में, जल बल होत अंगार ॥२॥
सत सब्द को कोई न चीन्हे, सूने हिरदे नहीं संभार । समझे साध जो आपको देखें, तामें बड़ी अंधार ॥३॥
रे यामें केते आप कहावें स्याने, पर छूटत नहीं विकार । स्यानप लेके कंठ बंधाए, या छल रच्यो है नार ॥४॥
रे मूढ़मती या फंद में उरझे, उपजत नहीं विचार । आप न चीन्हें घर ना सूझे, न लखें रचनहार ॥५॥
अपनी मत ले ले साधू बोले, सब्द भए अपार । बोहोत सबद को अर्थ न उपजे, या बल सुपन धुतार ॥६॥
यामें सतगुर मिले तो संसे भानें, पैंडा देखावे पार । तब सकल सबद को अर्थ उपजे, सब गम पड़े संसार ॥७॥
तब बल ना चले इन नारी को, लोप न सके लगार । महामत यामें खेलत पिया संग, नेहेचल सुख निरधार ॥८॥
॥ प्रकरण ॥२२॥ चौपाई ॥२६२॥
