किरन्तन - प्रकरण २३
राग गौड़ी
रे हो दुनियां को तूं कहा पुकारे, ए सब कोई है स्याना । ए मदमाती अपने रंग राती, करत मन का मान्या ॥१॥
रे हो याही फंद में साध संतरी, पुकार पुकार पछताना । कोई कहे दुनियां बुरी करत है, कोई भली कहे भुलाना ॥२॥
रे हो बोहोत दिन बिगूती यामें, कर कर ग्यान गुमाना । चुप कर चतुराई लिए जात है, तूं न कर निंदा न बखाना ॥३॥
रे हो तूं कर तेरी होत अबेरी, आप न देखे उरझाना । अब तूं छोड़ सकल बिध, जात अवसर तेरा जान्या ॥४॥
एही शब्द एक उठे अवनी में, नहीं कोई नेह समाना । पेहेचान पिउ तूं अछरातीत, ताही से रहो लपटाना ॥५॥
अहनिस आवेस हुअड़ा अंग में, फिरया दिलड़ा हुआ दिवाना । महामत प्रेमें खेले पिया सों, ए मद है मस्ताना ॥६॥
॥ प्रकरण ॥२३॥ चौपाई ॥२६८॥
