किरन्तन - प्रकरण २४ | Kirantan prakaran 24
राग श्री केदारो
रे मन भूल ना महामत, दुनियां देख तूं आप संभार । ए नाहीं दुनियां बावरी, ए रच्यो माया ख्याल ॥१॥
रे मन त्रिखा न बूझे तेरी झांझुए, प्रतिबिंब पकरयो न जाए । ज्यों जलचर जल बिना ना रहे, जो तूं करे अनेक उपाए ॥२॥
रे मन सृष्ट सकल सुपन की, तूं करे तामें पुकार । असत सत को ना मिले, तूं छोड़ आप विकार ॥३॥
रे मन सुपन का घर नींद में, सो रहे न नींद बिगर । याको कोट बेर परबोधिए, तो भी गले नहीं पत्थर ॥४॥
वासना होएगी बेहद की, सो क्यों छोड़े अपनी पर । ओ सुपन में एक सब्द सुनते, उड़ जासी नींदर ॥५॥
सत सब्द को सोई चीन्हे, जो होए वासना ब्रह्म । ए तो असत उलटिए खेल रच्यो है, देत देखाई सब भ्रम ॥६॥
असत तिन को भरम कहिए, होत है जिनको नास । ए तो चौदे चुटकी में चल जासी, यों कहत सुकजी व्यास ॥७॥
तूं उलट याको पीठ दे, प्रेमें खेल पियासों रंग । ओ आए मिलेंगे आपहीं, जासों तेरा है सनमंध ॥८॥
तेरे संगी तोहे अबहीं मिलेंगे, तूं करे क्यों न करार । महामत मन को दृढ़ कर, समरथ स्याम भरतार ॥९॥
॥ प्रकरण ॥२४॥ चौपाई ॥२७७॥
