किरन्तन - प्रकरण २५
राग श्री गौड़ी
रस मगन भई सो क्या गावे । बिचली बुध मन चित मनुआ, ताए सबद सीधा मुख क्यों आवे ॥१॥
बिचले नैन श्रवन मुख रसना, बिचले गुन पख इंद्री अंग । बिचली भांत गई गत प्रकृत, बिचल्यो संग भई और रंग ॥२॥
बिचली दिसा अवस्था चारों, बिचली सुध न रही सरीर । बिचल्यो मोह अहंकार मूलथें, नैनों नींद न आवे नीर ॥३॥
बिचल गई गम वार पार की, और अंग न कछु ए सान । पिया रस में यों भई महामत, प्रेम मगन क्यों करसी गान ॥४॥
॥ प्रकरण ॥२५॥ चौपाई ॥२८१॥
