किरन्तन - प्रकरण २६ | Kirantan prakaran 26
राग मारू
खोज बड़ी संसार रे तुम खोजो साधो, खोज बड़ी संसार । खोजत खोजत सतगुर पाइए, सतगुर संग करतार ॥१॥
भगत होत भगवान की, किव कर कहावें सिध साध । गुन अंग इंद्री के बस परे, ताथें बांधत बंध अगाध ॥२॥
सतगुर क्यों पाइए कुली में, भेखें बिगारयो वैराग । डिंभकाइए दुनियां ले डबोई, बाहेर सीतल मांहें आग ॥३॥
गोविंद के गुन गाए के, तापर मांगत दान । धिक धिक पड़ो ते मानवी, जो बेचत हैं भगवान ॥४॥
उदर कारन बेचें हरी, मूढ़ों एही पायो रोजगार । मारते मुख ऊपर, वाको ले जासी जम द्वार ॥५॥
बैठत सतगुर होए के, आस करें सिष्य केरी । सो डूबे आप सिष्यन सहित, जाए पड़े कूप अंधेरी ॥६॥
जो मांहें निरमल बाहेर दे न देखाई, वाको पारब्रह्म सों पेहेचान । महामत कहे संगत कर वाकी, कर वाही सों गोष्ट ग्यान ॥७॥
॥ प्रकरण ॥२६॥ चौपाई ॥२८८॥
