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किरन्तन - प्रकरण २८

राग श्री आसावरी

मैं पूछों पांड़े तुम को, तुम कहो करके विचार । सास्त्र अर्थ सब लेवहीं, पर किने न कियो निरधार ॥१॥

माया मोह अहंकार थें, ए सबे उतपन । अहंकार मोह माया उड़ी, तब कहां है ब्रह्म वतन ॥२॥

कोई कहे ब्रह्म आतमा, कोई कहे पर आतम । कोई कहे सोहं सब्द ब्रह्म, या बिध सब को अगम ॥३॥

कोई कहे ए सबे ब्रह्म, रहत सबन में व्याप । कोई कहे ए सबे छाया, नांही यामें आप ॥४॥

कोई कहे ओ निरगुन न्यारा, रहत सबन से असंग । कोई कहे ब्रह्म जीव ना दोए, ए सब एकै अंग ॥५॥

कोई कहे ए तेज पुंज, याकी किरना सबे संसार । कोई कहे याको अंग न इंद्री, निरंजन निराकार ॥६॥

कोई कहे ओ पुरूख उत्तम, और ए सबे सुपन । कोई कहे ए अलख अलहा, कोई कहे सब सुन्न ॥७॥

कोई कहे ओ सदा सिव, और न कोई देव । कोई कहे आद नारायन, करत कमला जाकी सेव ॥८॥

कोई कहे आदे आद माता, और न कोई क्यांहें । सिव नारायन सबे याथें, या बिन कछुए नाहें ॥९॥

कोई कहे याको करम करता, सब बंधे आवें जाए । तीनों गुन भी करमें बांधे, सो फेर फेर फेरे खाए ॥१०॥

कोई कहे ए सबे काल, करम सक्त उपाए । खेलावे अपने मुख में, आखिर दोऊ को खाए ॥११॥

कोई करे काल को संजम, कोई दिन काया बचाए । कोई राते करामतें, यों सब निगम नचाए ॥१२॥

पढ़े गुनें विकार न छूटे, आग न अंगथें जाए । आप वतन चीन्हे बिना, तो लों जल बिन गोते खाए ॥१३॥

ए संसे सब समझाए के, कोई अंग करे उजास । सो गुर मेरा मैं सेवों ताए, सुध चित होए दास ॥१४॥

मैं तो खोजों सुध पार की, कोई न देवे बताए । मोह अहंकार के बीच में, सब इतहीं रहे उरझाए ॥१५॥

समझे बिना सुख पार को नाहीं, जो उदम करो कई लाख । तोलों प्रेम न उपजे पूरा, जो लों अंदर न देवे साख ॥१६॥

ए धोखे गुर सर्वग्यन भानें, जिन पाया सब विवेक । बाहेर उजाला करके, आखिर देखावें एक ॥१७॥

महामत सो गुर कीजिए, जो बतावे मूल अंकूर । आतम अर्थ लगावहीं, तब पिया वतन हजूर ॥१८॥

॥ प्रकरण ॥२८॥ चौपाई ॥३२८॥

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