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किरन्तन - प्रकरण २९

राग रामकली

संत जी सुनियो रे, जो कोई हंस परम । मैं पूछत हों परआतमा, मेरा भानो एही भरम ॥१॥

जिन जानो विवादे पूछे, मैं जग्यासू करों खोज । जो लों धोखा न मिटे, साधो तो लों न छूटे बोझ ॥२॥

कोई कहे ए भरम की बाजी, ज्यों खेलत कबूतर । तो कबूतर जो खेल के, सो क्यों पावें बाजीगर ॥३॥

कोई कहे ए ब्रह्मकी आभा, आभा तो आपसी भासे । तो ए आभा क्यों कहिए ब्रह्मकी, जो होत हैं झूठे तमासे ॥४॥

कोई कहे ए कछुए नाहीं, तो ए भी क्यों बनिआवे । जो यामें ब्रह्म सत्ता न होती, तो अधखिन रहने न पावे ॥५॥

कोई कहे ए सबे ब्रह्म, तब तो अग्यान कछुए नाहीं । तो खट सास्त्र हुए काहे को, मोहे ऐसी आवत मन माहीं ॥६॥

कोई कहे ए पुरूख प्रकृती, मिल रचियो खेल एह । तो सूरज दृष्टे क्यों रहे अंधेरी, ए भी बड़ा संदेह ॥७॥

कोई कहे ए सबे सुपना, न्यारा खावंद है और । तो ए सुपना जब उड़ गया, तब खावंद है किस ठौर ॥८॥

ऊपर तले मांहें बाहेर, दसों दिसा सब माया । खट प्रमानथें ब्रह्म रहित है, सो क्यों कर ढृढ़ाया ॥९॥

बुध तुरिया दृष्ट श्रवना, जो लों पोहोंचे मन । उतपन सारी आवटे, जो कछू कहिए वचन ॥१०॥

कोई कहे अद्वैत के कारन, द्वैत खोजी पर पर । अद्वैत सब्द जो बोलिए, तो सिर पड़े उतर ॥११॥

कोई कहे अद्वैत के आड़े, सब द्वैतै को विस्तार । छोड़ द्वैत आगे वचन, किने न कियो निरधार ॥१२॥

भोमका सात कही वसिष्टें, तामें पांचमी केवल विदेही । छठी को सब्द ना निकसे, तो सातमी दृढ़ क्यों होई ॥१३॥

पार वचन कहे कौन दूजा, सर्वग्यन को सब सूझे । ए संसे भानो आतम के, ज्यों परआतम बूझे ॥१४॥

परमहंस बिन कौन कहे, जिन तजे हैं तीन सरीर । कहे महामत महादिसा धनी की, कोई कर दयो जुदे खीर नीर ॥१५॥

॥ प्रकरण ॥२९॥ चौपाई ॥३४३॥

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