किरन्तन - प्रकरण ३
राग केदारो
साधो भाई चीन्हो सब्द कोई चीन्हो । ऐसो उत्तम आकार तोकों दीन्हों, जिन प्रगट प्रकास जो कीन्हों ॥१॥
मानखें देह अखण्ड फल पाइए, सो क्यों पाए के वृथा गमाइए । ए तो अधखिन को अवसर, सो गमावत मांझ नींदर ॥२॥
सब्दा कहे प्रगट प्रवान, सब्दा सतगुरसों करावे पेहेचान । सतगुर सोई जो अलख लखावे, अलख लखे बिन आग न जावे ॥३॥
सास्त्र ले चले सतगुर सोई, बानी सकल को एक अर्थ होई । सब स्यानों की एक मत पाई, पर अजान देखे रे जुदाई ॥४॥
सास्त्रों में सबे सुध पाइए, पर सतगुर बिना क्यों लखाइए । सब सास्त्र सब्द सीधा कहे, पर ज्यों मेर तिनके आड़े रहे ॥५॥
सो तिनका मिटे सतगुर के संग, तब पारब्रह्म प्रकासे अखंड । सतगुरजी के चरन पसाए, सब्दों बड़ी मत समझाए ॥६॥
तब खोज सब्द को लीजे तत्व, तौल देखिए बड़ी केही मत । जासों पाइए प्रान को आधार, सो क्यों सोए गमावे रे गमार ॥७॥
यामें बड़ी मत को लीजे सार, सतगुर याहीं देखावें पार । इतहीं बैकुंठ इतहीं सुन्य, इतहीं प्रगट पूरन पारब्रह्म ॥८॥
ए बानी गरजत मांझ संसार, खोजी खोज मिटावे अंधार । मूढ़मती न जाने विचार, महामत कहें पुकार पुकार ॥९॥
॥ प्रकरण ॥३॥ चौपाई ॥२४॥
