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किरन्तन - प्रकरण ३०

राग श्री

चीन्हे क्यों कर ब्रह्म को, ए तो गुन ही के अंग को विकार । बाजीगरें बाजी रची, मूल माया तें मोह अहंकार ॥१॥

जाको पेड़ प्रतिबिंब प्रकृती, पांच तत्व ही को आकार । मांहें खेले निरगुन व्यापक, लिए माया मोह अहंकार ॥२॥

लोक चौदे दसो दिस, सब नाटक स्वांग संसार । आवे नैन श्रवन मन वचन, ए सब माया मोह अहंकार ॥३॥

क्या दानव क्या देवता, क्या तिर्थंकर अवतार । ब्रह्मा विष्णु महेस लों, सो भी पैदा माया मोह अहंकार ॥४॥

अब औरन की मैं क्या कहूं, जो बड़कों का ए हाल । जल जैसे तरंग तैसे, उठे माया मोह अहंकार ॥५॥

जो बंध बांधे बाप ने, बेटे चले जाए तिन लार । जीव उरझे जाली छल की, ए सब माया मोह अहंकार ॥६॥

दयोहरे मसीत अपासरे, सब लगे माहें रोजगार । बाहेर देखावें बंदगी, मांहें माया मोह अहंकार ॥७॥

जुदे जुदे भेख दरसनी, अनेक इष्ट आचार । धरे नाम धनी के जुदे जुदे, पैंडे चलें माया मोह अहंकार ॥८॥

खोज खोज खट सास्त्र हुए, अनेक वचन विस्तार । करम उपासना ग्यान की, बानी थकी मांहें माया मोह अहंकार ॥९॥

सब्द सुनें एक दूजे के, फेर फेर करें विचार । किव कर नाम धरें अपने, सब मगन माया मोह अहंकार ॥१०॥

ए बानी कथें सब अगम, मांहें गुझ सब्द हैं पार । सो ए कैसे कर समझहीं, मोहोरे माया मोह अहंकार ॥११॥

यामें जीव दोए भाँत के, एक खेल दूजे देखनहार । पेहेचान न होवे काहू को, आड़ी पड़ी माया मोह अहंकार ॥१२॥

ए खेल किया जिन खातिर, सो तो कोई हैं सिरदार । जो लों न होवें जाहेर, तो लो उड़े न माया मोह अहंकार ॥१३॥

ऐसे खेल अनेक एक खिन में, करे अग्याएँ करतार । सो करतार ठौर क्यों पाइए, जो लों उड़े न माया मोह अहंकार ॥१४॥

महामत होसी सब जाहेर, मिले अछरातीत भरतार । वैराट होसी नेहेचल, उड़यो माया मोह अहंकार ॥१५॥

॥ प्रकरण ॥३०॥ चौपाई ॥३५८॥

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