किरन्तन - प्रकरण ३१ | Kirantan prakaran 31
राग श्री सोरठ
कलि में देख्या ग्यान अचंभा । बातन मोहोल रचें अति सुंदर, चेजा जिमी न थंभा ॥१॥
अंग न इंद्री अंतस्करन वाचा, ब्रह्म न पोहोंचे कोए । यों कहें साख पुरावें श्रुती, फेर कहें अनुभव होए ॥२॥
अहंब्रह्म अस्मी होए के बैठें, तत्वमसी और कहावें । स्वामी सिष्य न क्रिया करनी, यों महा वाक्य दृढ़ावें ॥३॥
खट प्रमान से ब्रह्म है न्यारा, सो कहें अद्वैत हम आप । माया ईश्वर त्रिगुन हमथें, हमहीं रहे सबमें व्याप ॥४॥
ईश्वर फिरे न रहें त्रिगुन, त्रिगुन चलें जीव भेले । ए कहावें ब्रह्म सब पैदास याथें, और जात हैं आप अकेले ॥५॥
कूवत कछुए न पाइए मांहें, खेलें मोह में परे परवस मन । भोमका एक न चढ़ सकें, कहावें ईश्वर को महाकारन ॥६॥
तीन सरीर उड़ावें मुख थें, आप होत हैं ब्रह्म । पूछे तें कहें हम भोगवे, प्रालब्ध जो करम ॥७॥
माया ईश्वर तें होत हैं न्यारे, न्यारे होत तीन देह । अद्वैत को प्रालब्ध लगावें, देख्या ग्यान बड़ा ब्रह्म एह ॥८॥
ऐसे कोट ब्रह्मांड होवें पल में, अद्वैत के हुकम । ए कहावें ब्रह्म सुध नहीं ब्रह्म घर की, द्वैत अद्वैत नहीं गम ॥९॥
सुकमुनी बानी बोल्या वेदांत, सो इनों क्यों समझी जाए । होसी प्रगट प्रकास निज बुध का, सो महामत देसी बताए ॥१०॥
॥ प्रकरण ॥३१॥ चौपाई ॥३६८॥
