किरन्तन - प्रकरण ३२
राग श्री गौड़ी
भाई रे ब्रह्मग्यानी ब्रह्म देखलाओ, तुम सकल में सांई देख्या । ए संसार सकल है सुपना, तो तुम पारब्रह्म क्यों पेख्या ॥१॥
सत सुपने में क्योंकर आवे, सत सांई है न्यारा । तुम पारब्रह्म सों परच्या नाहीं, तो क्यों उतरोगे पारा ॥२॥
तुम बैकुंठ जमपुरी एक कर देखी, तब तो सास्त्र पुरान सब भान्या । सुकदेव व्यास के वचन बिना, कौन कहे मैं जान्या ॥३॥
यामें बड़भागी भए वल्लभाचारज, जाको सुकदेव का गुन भाया । उत्तम टीका कीन्ही दसम की, तो इन ए फल पाया ॥४॥
बिना पुरान प्रकास न होई, सास्त्र बिना कौन माने । एक अखर को अर्थ न आवे, तो ब्रह्म भरम में आने ॥५॥
काल आवत कबूं ब्रह्म भवन में, तुम क्यों न विचारो सोई । अखंड सांई जो यामें होता, तो भंग ब्रह्मांड को न होई ॥६॥
तुम केवल काल तत्व ग्यानी, ब्रह्म ग्यानी भए । सब दरवाजे खोजे साधो, पर सुन्य छोड़ कोई ना गए ॥७॥
इन सुपने में सब कोई भूल्या, किनहूं न देख्या पार । बिध बिध सों भवसागर थाहया, सुकदेव व्यास पुकार ॥८॥
यामें प्रेम लछन एक पारब्रह्म सों, एक गोपियों ए रस पाया । तब भवसागर भया गौपद बछ, विहंगम पैंडा बताया ॥९॥
कई दरवाजे खोजे कबीरें, बैकुंठ सुन्य सब देख्या । आखिर जाए के प्रेम पुकारया, तब जाए पाया अलेखा ॥१०॥
भाई रे ब्रह्मग्यानी ब्रह्म सुपने में, महामत कहे यों पाइए । पार निकस के पूरन होइए, तब फेर सब दृष्टें देखाइए ॥११॥
॥ प्रकरण ॥३२॥ चौपाई ॥३७९॥
