किरन्तन - प्रकरण ३३
राग श्री गौड़ी
रे जीव जी जिन करो यासों नेहड़ा । जाको सनमुख नाहीं सरम, तासों नाहीं मिलवे को धरम । ए तो भुलवनी कोई भरम, कोहेड़ा सों लाग्यो करम ॥१॥
नामै जाको प्रपंच, तिन सबको मूल सरीर । या बन थें बाग विस्तरयो, जानो भरिया मृगजल नीर ॥२॥
रे जीव सरीर मंदिर सोहामनों, चौदे खूने रे अवास । इनके भरोसे जे रहे, ते निकस चले निरास ॥३॥
खास छज्जे गोख जालियां, यामें केती मिलाई धात । संधो संध समारिया, मिने हिकमत कई हिकात ॥४॥
मेहेनत करी केती या पर, बिध बिध बांधे बंध । जानिए सदा नेहेचल, ए रच्यो ऐसी सनंध ॥५॥
गुन पख अंग इंद्रियां, सबके जुदे जुदे स्वाद । तरफ अपनी खैंचहीं, खेलत मिने विवाद ॥६॥
या बन थें बाग रंग फूलिया, जानें लेसी सुख अपार । अधबीच उछेदिया, सो करता गया पुकार ॥७॥
मोहे बाग रंग मंदिरों, सेजड़िएँ सोए करार । सो काढ़े कंठ पकड़ के, गए कल कलते नर नार ॥८॥
ए अनमिलती सों न मिलिए, जाको सांचो नाहीं संग । नाहीं भरोसो खिन को, ज्यों रैनी को पतंग ॥९॥
क्यों रे नेहड़ा यासों कीजिए, जो मिलके करे भंग । एक रस होइए क्यों तिनसे, नेहेचल नहीं जाको रंग ॥१०॥
ऐसे कई उजाड़े मंदिर, ए सब को देवे छेह । मिलापै में रंग बदले, अधबीच तोड़े नेह ॥११॥
रे जीव सरीर रची सेजड़ी, इत आवे नींद अपार । ए सूतेही पटकावहीं, पुकार न पीछे बहार ॥१२॥
यासों तो मनड़ो माने नहीं, जो छोड़े ए अंत्रीयाल । उरझाए आप न्यारी रहे, जीव को बाँध देवे मुख काल ॥१३॥
रे जीव नीके जानिए ए भुलवनी, इत भूले सब कोए । या रंग रसें जे भूलहीं, तिन करड़ी कसौटी होए ॥१४॥
कांटे चुभे दुख पाइए, सेहे न सके लगार । पर होत है मोहे अचंभा, ए क्यों सेहेसी जम मार ॥१५॥
इन गफलत के घर में, पड़ेगी बड़ी अगिन । पीछे लाख चौरासी देह में, जलसी रात और दिन ॥१६॥
ए देखी अजाड़ी आँखां खोल के, याकी तो उलटी सनंध । ए मोहड़ा लगावे मीठड़ा, पीछे पड़िए बड़े फंद ॥१७॥
ए अंधेरी है विकट, जाहेर रची जम जाल । ए पेहेले देखावे सुख सीतल, पीछे जाले अगिन की झाल ॥१८॥
ए धुतारी को न धीरिए, जो पलटे रंग परवान । ए विश्व बधे वैराट को, सो भी निगलसी निरवान ॥१९॥
ए सब मोहे इन मोहनी रे, पर इन बांध्यो न कासों मन । जीव को यातें बिछड़ते, बड़ी लागी दाझ अगिन ॥२०॥
॥ प्रकरण ॥३३॥ चौपाई ॥३९९॥
