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किरन्तन - प्रकरण ३४

अब देह की तरफ का जवाब

रे जीव जी तुमें लागी दाझ मुझ बिछड़ते, पर मैं खाक हुई तुम बिन । तुम मोही सों न्‍यारे भए, मोहे राखी नहीं किन खिन ॥१॥

मेरी सेवा जो करते साथीड़े, फूलड़े बिछावते सेज । सीतल वाए मोहे ढोलते, तिन जारी रेजा रेज ॥२॥

एक बाल टूटे दुख पावते, तिन जारी ले खोरने हाथ । मनुऐं उतारे या बिध, मेरे सोई संगी साथ ॥३॥

मैं पाले प्यार करके, सो वैरीड़े भए तिन ताल । मोसों तो राख्यो ए सनमंध, तुमें डारे ले जम जाल ॥४॥

तुम बंध पड़े जिन कारने, किया आप सों ज्यों । मुझ जैसे होए मोहे छेतरी, तुमको दई अगिन त्यों ॥५॥

मैं तो आई तुम खातिर, तुम जानी नहीं सुपन । मैं तो सुपना हो गई, अब दुखड़े देखो चेतन ॥६॥

पेहेले क्यों न संभारिए, काहे को पड़िए जम फांस । लाख चौरासी अगनी, तित जलिए न कीजे बास ॥७॥

मोसों पेहेचान ना कर सके, मेरा मेला तो अधखिन होए । मेरी तो पेहेचान जाहेर, मुझे जाती देखे सब कोए ॥८॥

तुम जान बूझ मोहे मोहीसों, छोड़ के नेहेचल सुख । मैं तो आई भले अवसर, पर भूले सो पावे दुख ॥९॥

ए अवसर क्यों भूलिए, जित पाइए सुख अखंड । या घर बिना सो ना मिले, जो ढूंढ़ फिरो ब्रह्मांड ॥१०॥

इन पिंड में ब्रह्म दृढ़ किया, नेहेचल सुख परवान । अब खिन में घर देखिए, ऐसा समे न दीजे जान ॥११॥

और उपाय कई करो, पर पाइए न या घर बिन । अंदर जागके चेतिए, ए अवसर अधखिन ॥१२॥

कैसे कर याको खोजिए, ए तो कोहेड़ा आकार । ए ढूंढ़या बोहोतों कई बिध, पर किनहूँ न पाया पार ॥१३॥

बाहेर निकसो तो आप नहीं, और मांहें तो नरक के कुंड । ब्रह्म तो यामें न पाइए, ए क्यों कहिए ब्रह्म घर पिंड ॥१४॥

पवन जोत सब्दा उठे, नाड़ी चक्र कमल । इत कैयों कई बिध खोजिया, यामें ब्रह्म नहीं नेहेचल ॥१५॥

पारब्रह्म क्यों पाइए, ततखिन कीजे उपाए । कई ढूंढ़े मांहें बाहेर, बिना सतगुर न लखाए ॥१६॥

अब संग कीजे तिन गुर की, खोज के पुरूख पूरन । सेवा कीजे सब अंगसों, मन कर करम वचन ॥१७॥

सो संग कैसे छोड़िए, जो सांचे हैं सतगुर । उड़ाए सबे अंतर, बताए दियो निज घर ॥१८॥

पाइए सुध पूरन से, पैंडा बतावें पार । सब्द जो सारे सूझहीं, सब गम पड़े संसार ॥१९॥

पांच तत्व पिंड में हुए, सोई तत्व पांच बाहेर । पांचो आए प्रले मिने, सब हो गयो निराकार ॥२०॥

ए पांचो देखे विध विध, ए तो नहीं थिर ठाम । यामें सो कैसे रहे, नेहेचल जाको नाम ॥२१॥

पारब्रह्म जित रेहेत हैं, तित आवे नाहीं काल । उतपन सब होसी फना, ए तो पांचों ही पंपाल ॥२२॥

यामें अंतर वासा ब्रह्म का, सो सतगुर दिया बताए । बिन समझे या ब्रह्म को, और न कोई उपाए ॥२३॥

आंकड़ी अंतरजामी की, कबहूँ न खोली किन । आद करके अब लों, खोज थके सब जन ॥२४॥

ए पूरन के प्रकास थें, खुल गया अंतर सब । सो क्यों रेहेवे ढांपिया, प्रगट होसी अब ॥२५॥

जिनको सब कोई खोजहीं, ए खोली आंकड़ी तिन । तो इत हुई जाहेर, जो कारज है कारन ॥२६॥

घर ही में न्यारे रहिए, कीजे अंतरमें बास । तब गुन बस आपे होवहीं, गयो तिमर सब नास ॥२७॥

या बिध मेला पिउ का, पीछे न्यारे नहीं रैन दिन । जल में न्हाइए कोरे रहिए, जागिए मांहें सुपन ॥२८॥

या सुपन तें सुख उपज्यो, जो जाग के कीजे विचार । आतम भेली परआतमा, सुपन भेलो संसार ॥२९॥

इन बिध लाहा लीजिए, अनमिलती का रे यों । सुखड़ा दिया धुतारिए, याको बुरी कहिए क्यों ॥३०॥

जो सुख याथें उपज्यो, सो कहयो न किनहूँ जाए । पात्र होए पूरा प्रेम का, तिन का रस ताही में समाए ॥३१॥

ए वतनी सों गुझ कीजिए, जो खैंचे तरफ वतन । प्रेमै में भीगे रहिए, पिउ सों आनंद घन ॥३२॥

महामत पिया संग विलसहीं, सुख अखंड इन पर । धंन धंन प्रपंच ए हुआ, धंन धंन सो या मंदिर ॥३३॥

॥ प्रकरण ॥३४॥ चौपाई ॥४३२॥

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