किरन्तन - प्रकरण ३५
राग सिंधुड़ा
वालो विरह रस भीनों रंग विरहमां रमाड़तो, वासना रूदन करे जल धार । आप ओलखावी अलगो थयो अमथी, जे कोई हुती तामसियों सिरदार ॥१॥
कलकली कामनी वदन विलखाविया, विश्वमां वरतियो हा हा कार । उदमाद अटपटा अंग थी टालीने, माननी सहुए मनावियो हार ॥२॥
पतिव्रता पल अंग थाए नहीं अलगियो, न कांई जारवंतियो विना जार । पात्रियो पिउ थकी अमें जे अभागणियों, रहियो अंग दाग लगावन हार ॥३॥
स्या रे एवा करम करया हता कामनी, धाम मांहें धणी आगल आधार । हवे काढ़ो मोह जल थी बूडती कर ग्रही, कहे महामती मारा भरतार ॥४॥
॥ प्रकरण ॥३५॥ चौपाई ॥४३६॥
