किरन्तन - प्रकरण ३६
हांरे वाला रल झलावियो रामतें रोवरावियो, जुजवे पर्वतों पाड़या रे पुकार । रणवगडा मांहें रोई कहे कामनी, धणी विना धिक धिक आ रे आकार ॥१॥
वेदना विखम रस लीधां अमें विरहतणां, हवे दीन थई कहूं वारंवार । सुपनमां दुख सहया घणां रासमां, जागतां दुख न सेहेवाए लगार ॥२॥
दंत तरणां लई तारूणी तलफियो, तमें बाहो दाहो दीन दातार । खमाए नहीं कठण एवी कसनी, राखो चरण तले सरण साधार ॥३॥
हवे हारया हारया हूं कहूं वार केटली, राखो रोतियो करो निरमल नार । कहे महामती मेहेबूब मारा धणी, आ रे अर्ज रखे हाँसीमां उतार ॥४॥
॥ प्रकरण ॥३६॥ चौपाई ॥४४०॥
