किरन्तन - प्रकरण ३७
हांरे वाला बंध पड़या बल हरया तारे फंदड़े, बंध विना जाए बांधियो हार । हंसिए रोइए पड़िए पछताइए, पण छूटे नहीं जे लागी लार कतार ॥१॥
जेहेर चढ़यो हाथ पांउं झटकतियो, सरवा अंग साले कोई सके न उतार । समरथ सुखथाय साथने ततखिण, गुणवंता गारूडी जेहेर तेहेने तेणी विधें झार ॥२॥
मांहें धखे दावानल दसो दिसा, हवे बलण वासनाओं थी निवार । हुकम मोहथी नजर करो निरमल, मूल मुखदाखी विरह अंग थी विसार ॥३॥
छल मोटे अमने अति छेतरया, थया हैया झांझरा न सेहेवाए मार । कहे महामती मारा धणी धामना, राखो रोतियों सुख देयो ने करार ॥४॥
॥ प्रकरण ॥३७॥ चौपाई ॥४४४॥
