किरन्तन - प्रकरण ३९
हांरे वाला कांरे आप्या दुख अमने अनघटतां, ब्राध लगाडी विध विध ना विकार । विमुख कीधां रस दई विरह अवला, साथ सनमुख मांहें थया रे धिकार ॥१॥
अनेक रामत बीजी हती अति घणी, सुपने अग्राह ठेले संसार । उघड़ी आंख दिन उगते एणे छले, जागतां जनम रूडा खोया आवार ॥२॥
सनमुख तमसूं विरह रस तम तणो, कां न कीधां जाली बाली अंगार । त्राहि त्राहि ए वातों थासे घेर साथमां, सेहेसूं केम दाग जे लाग्या आकार ॥३॥
विरह थी विछोडी दुख दीधां विसमां, अहनिस निस्वासा अंग उठे कटकार । दुख भंजन सहु विध पिउ जी समरथ, कहे महामती सुख देंण सिणगार ॥४॥
॥ प्रकरण ॥३९॥ चौपाई ॥४५२॥
