किरन्तन - प्रकरण ४
राग श्री गौड़ी
साधो हम देख्या बड़ा तमासा । विश्व देख भया मैं विस्मय, देख देख आवत मोहे हासा ॥१॥
मेरी मेरी करते दुनी जात है, बोझ ब्रह्मांड सिर लेवे । पाउ पलक का नहीं भरोसा, तो भी सिर सरजन को न देवे ॥२॥
सिर ले काम करे माया को, निसंक पछाड़े आप अंग । न करे भजन दोष देवें सांई को, कहे दया बिना न होवे साध संग ॥३॥
बांधत बंध आपको आपे, न समझे माया को मरम । अपनों कियो न देखे अंधे, पीछे रोवें दोष दे दे करम ॥४॥
समझे साध कहावें दुनी में, बाहेर देखावें आनंद । भीतर आग जले भरम की, कोई छूट न सके या फंद ॥५॥
परत नहीं पेहेचान पिंड की, सुध न अपनों घर । मुखथें कहे मोहे संसे मिट्या, मैं देखे साध केते या पर ॥६॥
साध सुने मैं देखे केते, अगम कर कर गावें । नेहेचे जाए करें निराकार, या ठौर चित ठेहेरावें ॥७॥
जो न कछू गाम नाम न ठाम, सो सत सांई निराकार । भरम के पिंड असत जो आपे, सो आप होत आकार ॥८॥
जिन मंडल ए मांडे मंडप, थोभ न थंभ न बंध । वाको नाहीं केहेत क्यों साधो, ए रच्यो किन कौन सनंध ॥९॥
जिन सायर खनाए पहाड़ चुनाए, रवि ससि नखत्र फिराए । फिरत अहनिस रंग रूत फिरती, ऐसे अनेक वैराट बनाए ॥१०॥
जिन खिन में तत्व पाँच समारे, नास करे खिन मांहीं । ए कहाँ से उपाय कहाँ ले समाए, ए विचारत क्यों नांहीं ॥११॥
सतगुर साधो वाको कहिए, जो अगम की देवे गम । हद बेहद सबे समझावे, भाने मनको भरम ॥१२॥
महामत कहे गुर सोई कीजे, जो अलख की देवे लख । इन उलटी से उलटाए के, पिया प्रेमें करे सनमुख ॥१३॥
॥ प्रकरण ॥४॥ चौपाई ॥३७॥
