किरन्तन - प्रकरण ४०
हांरे वाला अगिन उठे अंग ए रे अमारड़े, विमुख विप्रीत कमर कसी हथियार । स्वाद चढ्या स्वाम द्रोही संग्रामें, विकट बंका कीधा अमें आसाधार ॥१॥
कुकरम कसाब जुध कई करावियां, पलीत अबलीस अम मांहें बेसार । जागतां दिन कई देखतां अमने छेतरया, खरा ने खराब ए खलक खुआर ॥२॥
ओलखी तमने अमें जुध कीधां तमसूं, मन चित बुध मोह ग्रही अहंकार । ए विमुख वातों मोटे मेले वंचासे, मलसे जुथ जहां बारे हजार ॥३॥
कहे महामती हूं गांऊं मोहोरे थई, पण विमुख विधो वीती सहु मांहें नर नार । धाम मांहें धणी अमें ऊंचूं केम जोईसूं, पोहोंचसे पवाड़ा परआतम मोंझार ॥४॥
॥ प्रकरण ॥४०॥ चौपाई ॥४५६॥
