किरन्तन - प्रकरण ४१
राग श्री
करनी तुमारी मेरी मैं तौली, जैसे सत असत । हो धनी मेरे, एती है तफावत ॥१॥
पिया ऐसी निपट मैं क्यों भई, कठिन कठोर अति ढीठ । श्री धाम धनी पेहेचान के, फेर फेर देत मैं पीठ ॥२॥
अंदर परदा उड़ाइया, तो भी न बदल्या हाल । नकस न मिट्यो मोह मूल को, ताथें नजरों न नूरजमाल ॥३॥
इन इंद्रियन की मैं क्या कहूं, ए तो अवगुन हीं की काया । इन से देखूं क्यों साहेब, एही भई आड़ी माया ॥४॥
निरमल नजरों न आवहीं, ले बैठी संग चंडाल । उपजत ऐसी अंगथें, उतारूं उलटी खाल ॥५॥
सब अंग काट चीरा करूं, मांहें भरों मिरच और लून । कई कोट बेर ऐसी करूं, तो भी न छूटे ए खून ॥६॥
हैड़े में ऐसी उठत, सब अंग करूं टूक टूक । हड्डियां सब जुदी करूं, भान करूं भूक भूक ॥७॥
मैं होत सरमिंदी साथ में, ए क्यों ए न जावे दुख । जब जाग बैठूं आगे धनी, तब क्यों देखूं सनमुख ॥८॥
आंखां क्यों उठाऊंगी, मुझे मारेगी बड़ी सरम । ऐसी कबूं किन न करी, सो मैं किए चंडाल करम ॥९॥
रोम रोम कई कोट अवगुन, ऐसी मैं गुन्हेगार । ए तो कही मैं गिनती, पर गुन्हे को नाहीं सुमार ॥१०॥
जेते कहे मैं अवगुन, तेते हर रोम दाग । सो हर दम आतम को लगे, तब मैं बेठूं जाग ॥११॥
जाको गिनती मैं अपने, सोई देखे दुस्मन । देखे देखाए तो भी ना छूटे, कोई ऐसी अग्यां बल कुंन ॥१२॥
रोम रोम सूली चढूं, सब अंग निकसे फूट । ऐसी करूं जो आप से, तो भी अवगुन एक ना छूट ॥१३॥
ए नाहीं अवगुन और ज्यों, मेरे तो लेप बजर । ए बिध सोई जानहीं, जिनकी अंतर खुली नजर ॥१४॥
ए लेप बज्र की मैं क्या कहूं, ए अवगुन सब्दातीत । धनी आप दे करी आपसी, एही पिया की रीत ॥१५॥
धनी जी के गुन मैं क्या कहूं, इन अवगुन पर एते गुन । महामत कहे इन दुलहे पर, मैं वारी वारी दुलहिन ॥१६॥
॥ प्रकरण ॥४१॥ चौपाई ॥४७२॥
