किरन्तन - प्रकरण ४२ | Kirantan prakaran 42
राग श्री काफी
मीठडा मीठा रे, मूने वचनिएं का वाहो । मीठा ते मुखना लऊं मीठडा, कां प्रीतडी करीने परा थाओ ॥१॥
सनेह सनमंधडो समझावीने, अंतराय आडी टाली । हवे अधखिण विरह सही न सकूं, मारे न आवे अवसरियो वाली ॥२॥
हवे विलखूं छूं वाला विना, हूँ तो प्रेम नी बांधी पिड़ाऊं । कां अलगा आप ग्रहीने ऊभा, हूँ निस दिवस फड़कला खांऊं ॥३॥
हवे कहोने वालाजी केम करूं, केणी पेरे रेहेवाय । एम करता इन्द्रावती ने मंदिर पधारया, मारे आनंद अंग न माय ॥४॥
॥ प्रकरण ॥४२॥ चौपाई ॥४७६॥
