किरन्तन - प्रकरण ४३ | Kirantan prakaran 43
विनता विनवे रे, पिउजी रसिया तमें केहेवाओ । तो एकलड़ा अमने मूकी, अलगा केम करी थाओ ॥१॥
जो अलवेला एवा तमें, तो मंदिरिऐं न आवो केम म्हारे । हूं माननी मान मूकी केम कहूं, पण बोलड़े बंधाणी छूं तारे ॥२॥
तूं तो मूने जाणे छे जोपे, में तो घणी खीदड़ी खुदावी । अनेक विनवणी कीधी तें, तो हूं तारे वस आवी ॥३॥
हवे तो सर्वे में सोंप्यूं तुझने, मूल सनमंध सुध जोई । कहे इंद्रावती मुझ विना, तूंने एम वस न करे बीजो कोई ॥४॥
॥ प्रकरण ॥४३॥ चौपाई ॥४८०॥
