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किरन्तन - प्रकरण ४४

म्हारा वस कीधल वाला रे, अमथी अलगा केम करी थासो । हूं तो एवी नहीं रे सोहाली, जे वचनिऐं वहासो ॥१॥

ए तो नहीं अटकलनी ओलखांण, जे ततखिण रंग पलटाओ । सनमंधीनों रंग नेहेचल साचो, जिहां हूं तिहां तमें आवो ॥२॥

हवे अधखिण एक न मूकूं अलगा, प्रीत पेहेलानी ओलखाणी । साची सगाई कीधी प्रगट, सचराचर संभलाणी ॥३॥

प्रेम विनोद विलास माया मांहें, सुफल फेरो एम कीजे । अखण्ड आनंद सदा इंद्रावती घरे, पूरण सुख लाहो लीजे ॥४॥

॥ प्रकरण ॥४४॥ चौपाई ॥४८४॥

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