किरन्तन - प्रकरण ४६
प्रीत प्रगट केम कीजिए, कीजिए तो छानी छिपाए, मेरे पिउजी । तूं तो निलज नंदनो कुमार, मेरे पिउ जी ॥१॥
तूं देख भयो मोहे बावरो, मैं कुलवधुआ नार । तूं रोक रहयो मोहे राह में, घड़ी भई दोए चार ॥२॥
गलियन में दुरजन देखे, तोमें नहीं विचार । तूं कामी कछू ना देखही, पर सासुड़ी दे मोहे गार ॥३॥
कर जोरे कुच मरोरे, अंगिया नखन विडार । अधुर न छोड़े दंत सों, करेगो कहा अब रार ॥४॥
तूं बालक नेह न बूझहीं, मैं बरज्यो केतीक वार । मैं मेरो कियो पाइयो, अब कासों करों पुकार ॥५॥
सारी फारी कंठसर टोरी, टोरयो नवसर हार । अब घर कैसे जाइए, उलटाए दियो सिनगार ॥६॥
अब मिल रही महामती, पिउ सों अंगों अंग । अछरातीत घर अपने, ले चले हैं संग ॥७॥
॥ प्रकरण ॥४६॥ चौपाई ॥४९४॥
