किरन्तन - प्रकरण ४७
राग श्री गौरी
खोज थके सब खेल खसमरी । मन ही में मन उरझाना, होत न काहू गमरी ॥ टेक ॥१॥
मन ही बांधे मन ही खोले, मन तम मन उजास । ए खेल सकल है मन का, मन नेहेचल मन ही को नास ॥२॥
मन उपजावे मन ही पाले, मन को मन ही करे संघार । पांच तत्व इंद्री गुन तीनों, मन निरगुन निराकार ॥३॥
मन ही नीला मन ही पीला, स्याम सेत सब मन । छोटा बड़ा मन भारी हलका, मन ही जड़ मन ही चेतन ॥४॥
मन ही मैला मन ही निरमल, मन खारा तीखा मन मीठा । एही मन सबन को देखे, मन को किनहूं न दीठा ॥५॥
सब मन में ना कछू मन में, खाली मन मनही में ब्रह्म । महामत मन को सोई देखे, जिन दृष्टे खुद खसम ॥६॥
॥ प्रकरण ॥४७॥ चौपाई ॥५००॥
