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किरन्तन - प्रकरण ४९

राग देसाख

बाई रे वात अमारी हवे कोण सुणें, अमें गेहेलाने मलया । एहनो नेहडो सुणीने हूं तो घणुऐं नाठी, पणसूं कीजे जे पांणें पड्या ॥१॥

हूं मां हुती चतुराई त्यारे पांचमां पुछाती, ते चितडा अमारा चलया । मान मोहोत लज्या गई रे लोपाई, अमें माणस मांहें थी टलया ॥२॥

माणस होए ते तो अमने मां मलजो, जो तमे गेहेलाइए हलया । ओल्या वारसे वढसे खीजसे तमने, तोहे आवसो ते आंही पलया ॥३॥

गेहेले वालें अमने कीधां गेहेलड़ा, मलीने गेहेलाइए छलया । जात कुटमथी जूआ थया, हद छोडी वेहदमां भलया ॥४॥

देखीतां सुखड़ा में तो नाख्या उडाडी, दुस्तर दुखें न बलया । एहेनी गेहेलाइए अमने एवा कीधां, जईने अछरातीतमां गलया ॥५॥

बाई रे गिनान सब्द गम नहीं नवधाने, वेद पुराणें नव कलया । ए वात गेहेलड़ी करे रे महामती, मारे अखंड सुख फूले फलया ॥६॥

॥ प्रकरण ॥४९॥ चौपाई ॥५१२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-