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किरन्तन - प्रकरण ५१ | Kirantan prakaran 51

राग धनाश्री

आज वधाई वृज घर घर, प्रगट्या श्री नंद कुमार । दूध दधी ऊमर धोए, तोरण बांधे वृजनार ॥१॥

एक बीजीने छांटे नांचे, उमंग अंग न माय । अनेक विधना बाजा रस बाजे, गृह गृह उछव थाय ॥२॥

लईने वधावा सांचरी, भवन भवन थी नार । गाए ते गीत सोहामणां, साजे छे सकल सिणगार ॥३॥

अबीर गुलाल उछालती आवे, छाया ना सूझे सूर । चाल चरण छवे नहीं भोमें, जाणे उमडयो सागर पूर ॥४॥

जुथ जुजवे जुवंतियों, उछरंगतियो अपार । उछव करती आवियो, बाबा नंदतणें दरबार ॥५॥

धसमसियो मंदिरमां पेसे, माननी सर्वे धाए । नंद ने वधावो दई वल्या, मांडवे मंगल गाए ॥६॥

ब्राह्मण भाट गुणीजन चारण, मलया ते मांगण हार । निरत नटवा गंधर्व, राग सांगीत थेई थेई कार ॥७॥

नाद दुन्द पडछंदा पर्वतें, वरत्यो जय जय कार । नंद गोप सहु गेहेला हरखे, खोलावे भंडार ॥८॥

गाए गोधा अंन वस्तर पेहेराव्या, गोप सकल दातार । केहेने धन केहेने भूखन, नवनिध दे दे कार ॥९॥

ए लीला रे अखंड थई, एहनो आगल थासे विस्तार । ए प्रगट्या पूरण पार ब्रह्म, महामती तणों आधार ॥१०॥

॥ प्रकरण ॥५१॥ चौपाई ॥५२६॥

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