किरन्तन - प्रकरण ५२
राग श्री
सतगुर मेरा स्याम जी, मैं अहनिस चरणें रहूं । सनमंध मेरा याही सों, मैं ताथें सदा सुख लहूं ॥१॥
ए जो माया लोक चौदे, सब त्रिगुन को विस्तार । ए मोह अहंतें उपजें, ताथें छूटत नहीं विकार ॥२॥
इत सास्त्र सब्द कई पसरे, ताको खोज करे संसार । वाचा निवृत्ति मोह में, आड़ी भई निराकार ॥३॥
सुन्य निराकार पार को, खोज खोज रहे कई हार । बोहोतों बहुबिध ढूंढ़या, पर किया न किने निरधार ॥४॥
सो बुधजीऐं सास्त्र ले, सबहीं को काढ़यो सार । जो कोई सब्द संसार में, ताको भलो कियो निरवार ॥५॥
जा कारन माया रची, सास्त्र भी ता कारन । खेल भी एही देखहीं, और अर्थ भी लिए इन ॥६॥
ए माया जाकी सोई जाने, क्यों कर समझे और । बुधजी के रोसन थें, प्रकास होसी सब ठौर ॥७॥
किल्ली ल्याए वतन थें, सब खोल दिए दरबार । माया से न्यारा घर नेहेचल, देखाया मोहजल पार ॥८॥
ब्रह्मसृष्ट जाहेर करी, बुधजीए इत आए । अछरातीत को आनन्द, सत सुख दियो बताए ॥९॥
सब्द सुनाए सुक व्यास के, मोहे खिन में कियो उजास । उपनिषद अर्थ वेद के, ए गुझ कियो प्रकास ॥१०॥
इनसें सुध मोहे सब भई, संसे रह्यो न कोए । बुधजी बिना इन मोह में, प्रकास जो कैसे होए ॥११॥
संगी जो अपने सनमंधी, सो भी गए मांहें भूल । तो क्यों समझें जीव मोह के, जाको निद्रा मूल ॥१२॥
पिया मोहे अपनी जान के, अन्तर दई समझाए । ना तो आद के संसे अब लों, सो क्योंकर मेट्यो जाए ॥१३॥
ए बीतक कहूं सैयन को, जाहेर देऊं बताए । मोहे जगाई पिया ने, मैं देऊं सबे जगाए ॥१४॥
ए खेल हुआ सैयों खातिर, और खातिर अछर । सबके मनोरथ पूरने, देखाए तीनों अवसर ॥१५॥
जब माया मोह न अहंकार, ना विस्तरे त्रिगुन । ए दिल दे के समझियो, कहूंगी मूल वचन ॥१६॥
तब खेल हम मांगया, सो देखाया दो बेर । तामें बृज में खेले पिया संग, बीच मोह के अंधेर ॥१७॥
काल माया देखी नींद में, आधी नींद माया जोग । ताथें देखाई जगाए के, इत लेसी सबको भोग ॥१८॥
इन लीला की जो आतमा, सो करसी सबे पेहेचान । आवत दौड़े अंकूरी, ए ताए मिलसी निसान ॥१९॥
अखंड सुख जाहेर कियो, मूल बुध प्रकासी । देत देखाई जैसे दुनियां, पर अछरातीत के वासी ॥२०॥
खेल किया पेहेले बृज में, खेल दूजा वृन्दाबन । उमेद रही तो भी नेक सी, ताथें एह उतपन ॥२१॥
बृज रास ए सोई लीला, सोई पिया सोई दिन । सोई घड़ी ने सोई पल, वैराट होसी धंन धंन ॥२२॥
सखी एक दूजी को ढूंढहीं, आई जुदी जुदी इन बेर । प्रेम प्यासी पिया की, लई जो विरहा घेर ॥२३॥
अब ए लीला क्यों छानी रहे, सखियां मिली सब टोले । पल पल प्रकास पसरे, आगम ही आगम बोले ॥२४॥
ब्रह्मलीला ढांपी हती, अवतारों दरम्यान । सो फेर आए अपनी, प्रगट करी पेहेचान ॥२५॥
सो पेहेचान सबों पसराए के, देसी सुख वैराट । लौकिक नाम दोऊ मेट के, करसी नयो ठाट ॥२६॥
ए नित लीला बुध जी, करसी बड़ो विलास । दया भई दुनियां पर, होसी सबे अविनास ॥२७॥
सुर असुर ब्रह्मांड में, मिल कर गावसी ए सुख । इन लीला को जो आनंद, वरन्यो न जाए या मुख ॥२८॥
सब पर हुआ कलस, प्रेम आनंद भरपूर । महामत मोह अहं उड़यो, ऊग्यो अखंड वतनी सूर ॥२९॥
॥ प्रकरण ॥५२॥ चौपाई ॥५५५॥
