किरन्तन - प्रकरण ५३
राग श्री
धनी जी ध्यान तुमारे रे । धनी मेरे ध्यान तुमारे, बैठे बुधजी बरस सहस्त्र चार । छे सै साठ बीता समे, दुनियां को भयो आचार ॥१॥
हिन्दू मुसलमान रे फिरंगी कई जातें, होदी बोदी जैन अपार । वादे सो ब्रोध बधारिया, करी अगनी उदेकार ॥२॥
कहावें धरम पंथ रे लड़ें मांहें वैरें, अंग असुराई को अधिकार । पसु पंखी साधू न छूटे काहूं, पुकार न काहूं बहार ॥३॥
भाजे भजन रे बाजे उछव अटके, ढाहे मंदिर हरिद्वार । सत छोड़ सूरों नीचा देखिया, कमर बांधी रही तरवार ॥४॥
कसे साधू रे काहू भजन ना रहया, कुली बरस्या जलते अंगार । धखयो दावानल दसो दिसा, ऐसा भवड़ा हुआ भयंकर ॥५॥
मांस आहारी रे न दया डरे किनसे, ऐसा हुआ हाहाकार । बुधजी बिना वैराट में, ऐसो बरत्यो वेहेवार ॥६॥
आवसी धनी धनी रे सब कोई केहेते, आगमी करते पुकार । सो सत बानी सबों की करी, अब आए करो दीदार ॥७॥
कुरान पुरान रे वेद कतेबों, किए अर्थ सबे निरधार । टाली उरझन लोक चौदे की, मूल काढ़यो मोह अहंकार ॥८॥
सुन्य निरगुन निरंजन, देखे वैकुंठ निराकार । अछर पार अछरातीत, प्रेम प्रकास्यो पार के पार ॥९॥
पेहेरयो बागो रे बांधी कमर, अश्व उजले भए अस्वार । होसी बड़ा मेला बरस एके, साथ होत सबे तैयार ॥१०॥
॥ प्रकरण ॥५३॥ चौपाई ॥५६५॥
