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किरन्तन - प्रकरण ५४

राग श्री

हो साथ जी वेगे ने वेगे, वेगे ने मिलो रे सैयों समें रास को ॥ टेक ॥

कारज कारन की बात अति बड़ी, याको क्यों कहिए अवतार । रे साथ जी हुई अखंड निध पांचों भेली, कियो सो बड़ो विस्तार ॥१॥

धनी मैं अरधांग अछर मुझ माहीं, बुधजी बोले सो कई प्रकार । हुकम महंमद नूर ईसा भेला, कजा इमाम मेंहेंदी सिर मुद्दार ॥२॥

अंग समागम धनी के, हिरदे लियो सो सब विचार । साके सोले तोड़ी गुझ रहे, या दिन से कियो सो प्रगट पसार ॥३॥

आई नूर बुध वैराट माहीं, विश्व करी सो निरविकार । छोटे बड़े नर नार सबे मिल, रंगे गाऐं सो मंगल चार ॥४॥

काटे सो आउध असुरों के, पाड़ी पापीड़ा के सिर पर प्रहार । इने दुख दिए साध संत को, तो सेहेता है सिर पर मार ॥५॥

रूंधी रूदे त्रिगुन त्रैलोकी, बैठा था करके अंधार । अब प्रगटी जोत तले लागी आकासों, उड़ाए दियो जो थो धुसार ॥६॥

जुद्ध दारूण अति जोर हुआ, तिमर घोर झुंझार । प्रकासवान खांडा धार बुधें, निरमल कियो संसार ॥७॥

पड़या पड़छंदा पाताल आकासें, धरती धम धमकार । खल भल हुआ लोक चौदे, करत कालिंगा को संघार ॥८॥

घर घर उछव बाजे रस बाजे, चोहोटे चौवटे थेई थेईकार । पसु पंखी साधू कोई न दुखी, सुखे खेलें चरें चुगें करार ॥९॥

सत बरत्यो त्रिगुन त्रैलोकी, असत न रही लगार । काटी करम फांसी दुनियां की, पीछे निरमल किए सिरदार ॥१०॥

राई गौरी सावित्री जो कोई सती, सब धवल गावें नर नार । पुरूख दूजा कोई काहूं न कहावे, सबों भजिया कर भरतार ॥११॥

एक सृष्ट धनी भजन एकै, एक गान एक आहार । छोड़ के वैर मिले सब प्यार सों, भया सकल में जय जयकार ॥१२॥

मिलके साथ आवे दौड़ता, मिने सकुंडल सकुमार । निजधाम सें आई सखियां, जुथ चालीस सहस्त्र बार ॥१३॥

खेलें मिलके रास जागनी, भेलें इहां से चौबीस हजार । करसी लीला बरस दस तोड़ी, हाँस विलास आनन्द अपार ॥१४॥

बृजलीला लीला रास मांहें, हम खेले जान के जार । जागनी लीला जाग पेहेचान, पिउसों जान विलसे करतार ॥१५॥

सब्दातीत निध ल्याए सब्द में, मेट्यो सबन को अंधकार । तीसें सृष्ट विष्णु सौ बरसें, प्रेमें पीवेगा सब्दों का सार ॥१६॥

विष्णु को पोहोंचाए ठौर अछर हिरदे, बुधजी देएंगे खोल के द्वार । अखंड ब्रह्मांड बरस पचास पीछे, रहेसी हिरदे में खुमार ॥१७॥

किया जमा सब सब्दों का, धोए हाथ और हथियार । होसी नेहेचल सुख चौदे लोकों, हम देखे खेल कारन इन बार ॥१८॥

महामत जागसी साथ जी भेले, जहां बैठे मिने दरबार । हम उठ के आनंद करसी झीलना, हंस हंस करसी सिनगार ॥१९॥

तीन ब्रह्मांड लीला तीन अवस्था, खिनमें देखे खेले संग आधार । धनी मैं अरधांग साथ अंग मेरा, इन घर सदा हम नित विहार ॥२०॥

॥ प्रकरण ॥५४॥ चौपाई ॥५८५॥

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