Kuljam.org

विषय-सूची

किरन्तन - प्रकरण ५५

राग श्री धवल

आए आगम बानी इत मिली, विश्व मुख करत बखान । कौल सबन के पूरन भए, आए सो पोहोंचे निसान ॥१॥

चेतो सबे सत वादियो, सुनियो सो सतगुर मुख बान । धनी मेरा प्रभु विश्व का, प्रगटिया परवान ॥२॥

आगमी सब खड़े हुए, दिन बोहोत रहे थे गोप । आए धनी मेले मिने, प्रगटी है सत जोत ॥३॥

पेहेले मंडल में मांगी मुझे, सो आए ब्याही इत । कौल किया लिख्या सास्त्रों में, सो आए पोहोंची सरत ॥४॥

मैं जो आई ब्याहन दुलहे को, दुलहा आए मुझ कारन । बांधे पालवसों पालव, पाट बैठे दुलहा दुलहिन ॥५॥

सत पर सत दोऊ पर्वत, तोरन बांधे हैं बंध । बिन थलिऐ विवाह हुआ, हाथों हाथ जोड़े मूल सनमंध ॥६॥

मंडल अखंड में मांडवो, चौरी थंभ रोपे हैं चार । सो थंभ थापे थिर कर, कहूं सो तिन को प्रकार ॥७॥

एक बृज दूजो रास को, दूजे दोए इन वैराट । चारों थंभों चौरी रची, रच्यो सो नेहेचल ठाट ॥८॥

एक बेर एक मांडवे, मौर बांधियो सीस । ब्याही बारे हजार को, और हजार चौबीस ॥९॥

तीन फेरे दुलहे पीछे फिरी, चौथे फेरे आगल भई । अब ए लीला सब गावसी, सब मिल करि है सही ॥१०॥

और कागद सब उड़ गए, उड़यो सबों को अग्यान । पसरयो प्रकास जो पिउ को, ब्रह्म सृष्ट प्रगट भई पेहेचान ॥११॥

ठौर ठौर थाने दिए, मेला हुआ है मध देस । छत्रपति नमे नेहसों, राए राने पृथी के नरेस ॥१२॥

बैठे सिंघासन सिर छत्र, वैराट बरती है आन । मुकट मनी ढोलें चंवर, नवखंड घुरे हैं निसान ॥१३॥

जोत जाग्रत बुध जोर हुई, सत बानी कियो है विस्तार । कालिंगा कुली मारिया, सत सुख बरत्यो संसार ॥१४॥

प्रहलाद युधिष्ठिर वसुदेव, बलि रूकमांगद हरिचंद । सगाल दधीच मोरध्वज, कसनी कर छूटे या फंद ॥१५॥

सतवादी नाम केते लेऊं, कई हुए तरन तारन । सत न छोड़या कई दुख सहे, सो या दिन के कारन ॥१६॥

जोगारंभ कर देह रखी, नवनाथ जाए बसे बन । सिध चौरासी और कई जोगी, सो भी कारन या दिन ॥१७॥

असुर केते कहूं पीर कई, केते कहूं पैगंमर । आए मिले इत सब कोई, जेता कोई भेख धर ॥१८॥

बरना बरन वादे लड़ते, ब्रोध न छोड़ता कोए । चाल असत की चलते, हिंदू मुसलमान दोए ॥१९॥

बाघ बकरी एक संग चरें, कोई न करे किसी सों वैर । पसु पंखी सुखे चरें चुगें, छूट गयो सब को जेहेर ॥२०॥

सनमुख सब एक रस भए, भाग्यो सो विश्व को ब्रोध । घर घर आनंद उछव, कुली पोहोरो काढ़यो सबको क्रोध ॥२१॥

धनी आए मेरे लाड़ पालने, वतन पार के पार । कारज कारन महाकारन से, न्यारी हों इन पिउकी नार ॥२२॥

ए बात पोहोंची जाए वैकुंठ, बुधजीऐं उड़ायो उनमान । सुक सिव सन ब्रह्मा नमे, नमे विष्णु लखमी नारायन ॥२३॥

मुक्त दई सब जीवों को, पावें पसु पंखी नर नार । होसी वैराट ए धंन धंन, सुख आनंद अखण्ड अपार ॥२४॥

ए नेक करी मैं इसारत, याको आगे होसी बड़ो विस्तार । थोड़े से दिन में देखोगे, वरतसी जय जयकार ॥२५॥

साथ सुनो एक वचन, आवे बाई सकुंडल सकुमार । रास खेल घर चलसी, भेले इन भरतार ॥२६॥

कहे महामत ए सो खेल, जो तुम मांग्या था चित दे । देख खेल हंस चलसी, घर बातां करसी ए ॥२७॥

॥ प्रकरण ॥५५॥ चौपाई ॥६१२॥

इसी सन्दर्भ में देखें-