किरन्तन - प्रकरण ५६
आरती
राग श्री बसंत
भई नई रे नवों खंडों आरती, श्री विजिया अभिनंद की आरती । प्रेम मगन होए उतारती, सखी आप पिया पर वारती ॥१॥
दुष्टाई सबों की संघारती, सुख अखंड आनंद विस्तारती । जन सचराचर तारती, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥२॥
सैयां सब सिनगार साजती, मिने सूरत पिया की विराजती । ए सोभा इतहीं छाजती, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥३॥
झालर अगनित बाजे ले बाजती, ब्रह्मांड में नौबत गाजती । कलिजुग सैन्या सुन भाजती, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥४॥
सप्तधात सुन्य मण्डल थाल, निरंजन जोत भई उजाल । झलहलिया इत नूरजमाल, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥५॥
पसरी दया प्रगटे दयाल, काटे दुनी के करम जाल । चेतन व्यापी भए निहाल, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥६॥
सैन्या सहित आए त्रिपुरार, आए ब्रह्मा पढ़त मुख वेद चार । विष्णु बोलत बानी जय जय कार, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥७॥
आए धरमराए और इंद्र वरून, नारद मुन गंधर्व चौदे भवन । सुर असूरों सबों लई सरन, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥८॥
आए सनकादिक चारों थंभ, लिए खड़े संग विष्णु ब्रह्मांड । जो ब्रह्म अनभवी भए अखंड, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥९॥
जिन हद कर दई नवधा भगत, जुदी कर गाई पाई प्रेम जुगत । यों आए सुक व्यास बड़ी मत, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥१०॥
आए नवनाथ चौरासी सिध, बरस्या नूर सकल या बिध । इत आए बुधजी ऐसी किध, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥११॥
आए चारों संप्रदा के साधूजन, चार आश्रम और चार वरन । चारों खूटों के आए गावते गुन, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥१२॥
आए गछ चौरासी जो अरहंती, दत्तजी दसनामी जो महंती । आए करम उपासनी वेदांती, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥१३॥
आए खट दरसन खट सास्त्र भेदी, बहत्तर फिरके आए अथर वेदी । आए सकल कैदी और बे केदी, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥१४॥
बुधजी की जोतें कियो प्रकास, त्रैलोकी को तिमर कियो नास । लीला खेलें अखंड रास विलास, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥१५॥
पिया हुकमें गावें महामत, उड़ाए असत थाप्यो सत । सब पर कलस हुओ आखिरत, भई नई रे नवों खंडों आरती ॥१६॥
॥ प्रकरण ॥५६॥ चौपाई ॥६२८॥
