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किरन्तन - प्रकरण ५७ | Kirantan prakaran 57

भोग

राग श्री काफी

कृपा निध सुंदरवर स्यामा, भले भले सुंदरवर स्याम । उपज्यो सुख संसार में, आए धनी श्री धाम ॥१॥

प्रगटे पूरन ब्रह्म सकल में, ब्रह्म सृष्ट सिरदार । ईश्वरी सृष्ट और जीव की, सब आए करो दीदार ॥२॥

नित नए उछव आनंद, होत किरंतन सार । वैष्णव जो कोई खट दरसन, आए इष्ट आचार ॥३॥

भोजन सर्वे भोग लगावत, पांच सात अंन पाक । मेवा मिठाई अनेक अथाने, बिध बिध के बहु साक ॥४॥

अठारे बरन नर नारी आए, साजे सकल सिनगार । प्रेम मगन होए गावें पिया जी के, धवल मंगल चार ॥५॥

कई गंधर्व गुन गावें बजावें, कई नट नाचन हार । कई रिखि मुनी वेद पढ़त हैं, बरतत जय जयकार ॥६॥

जब की माया ए भई पैदा, ए लीला न जाहेर कब । बृज रास और जागनी लीला, ए जो प्रगटी अब ॥७॥

चारों तरफों चौदे लोकों, ए सुध हुई सबों पार । बाजे दुन्दुभि भई जीत सकल में, नेहेचल सुख बे सुमार ॥८॥

जोत उद्योत कियो त्रिलोकी, उड़यो मोह तत्व अंधेर । बरस्यो नूर वतन को, जिन भान्यो उलटो फेर ॥९॥

प्रगटे ब्रह्म और ब्रह्मसृष्टी, और ब्रह्म वतन । महामत इन प्रकास थें, अखंड किए सब जन ॥१०॥

॥ प्रकरण ॥५७॥ चौपाई ॥६३८॥

इसी सन्दर्भ में देखें-