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किरन्तन - प्रकरण ५९

राग श्री

ऐसा समे जान आए बुध जी, कर कोट सूर समसेर । सुनते सोर सब्द बानन को, होए गए सब जेर ॥१॥

काटे विकार सब असुरों के, उड़ायो हिरदे को अंधेर । काढ़यो अहंकार मूल मोह मन को, भान्यो सो उलटो फेर ॥२॥

वेद कतेब के जो अर्थ, ढांपे हुते सबों पास । विष्णु संग्राम मांगे जो असुर, ताको कियो कोट प्रकास ॥३॥

तब पेहेचान भई सकल, हुए जब सर्वग्यन । नेहेचल सूर ऊग्यो निज वतनी, हुओ मन को भायो सबन ॥४॥

बाल लीला भई बृज में, लीला किसोर वृन्दावन । जगंनाथ बुध जी जागनी, भई भोर लीला बुढ़ापन ॥५॥

राजा प्रजा बाला बूढ़ा, नर नारी ए सुमरन । गाए सुने ताए होवहीं, लीला तीनों का दरसन ॥६॥

सुर असुर सबों को ए पति, सब पर एकै दया । देत दीदार सबन को सांई, जिनहूं जैसा चाहया ॥७॥

साहेब के हुकमें ए बानी, गावत हैं महामत । निज बुध नूर जोस को दरसन, सबमें ए पसरत ॥८॥

॥ प्रकरण ॥५९॥ चौपाई ॥६६७॥

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