Kuljam.org

विषय-सूची

किरन्तन - प्रकरण ६

राग गौड़ी

भाई रे बेहद के बनजारे, तुम देखो रे मनुए का खेल । ए सब आग बिना दीया जले, याको रूई न बाती तेल ॥१॥

चारों तरफों चौदे लोकों, बैकुंठ लग पाताल । फूल पात फल नहीं या द्रखत को, काष्ट त्वचा मूल न डाल ॥२॥

देत देखाई तत्व पाँचों, मिल रचियो ब्रह्मांड । जिन से उपजे सो कछुए नाहीं, आप न पोते पिंड ॥३॥

नहीं पिंड पोते हाथ पांउ भी नाहीं, नाटक नाच देखावे । मुख न जुबाँ कछू नहीं याको, और बानी विविध पेरे गावे ॥४॥

आतम नारायन नाचत बुध ब्रह्मा, निस दिन फिरे नारद मन । वैराट नटवा नाचत विध विध सों, नचवत व्यास करम ॥५॥

ए मनुए की बाजी बाजी में मनुआ, जुदे जुदे खेल खेलावे । बरना बरन खेलत सब ऐसे, नए नए स्वांग बनावे ॥६॥

पारब्रह्म तो पूरन एक है, ए तो अनेक परमेस्वर कहावें । अनेक पंथ सब्द सब जुदे जुदे, और सब कोई सास्त्र बोलावे ॥७॥

रब्द करे औरन को निंदे, आपको आप बढ़ावे । ग्यान कथे गुन गाए आपके, होहोकार मचावे ॥८॥

दुबधा दिल में अवगुन ढूंढ़े, गुन चितसों न लगावें। भटकत फिरे भरम में भूले, अंग में आग धखावें ॥९॥

केते आप कहावें परमेश्वर, केते करत हैं पूजा । साध सेवक होए आगे बैठे, कहें या बिन कोई नहीं दूजा ॥१०॥

सास्त्र सब्द को अर्थ न सूझे, मत लिए चलत अहंकार । आप न चीन्‍हें घर न सूझे, यों खेलत मांझ अंधार ॥११॥

बाजी एक देखाऊं दूजी, जो खेलत हैं उजियारे । भेख बनाए के नाचत सनमुख, एक ठाट लिए चारे ॥१२॥

आतम विष्णु नाचत बुध सनतजी, गोकुल ग्रह्यो सिव मन । करम सुकदेव नाचत नचवत, गावत प्रगट वचन ॥१३॥

ए सब खेल करत है मनुआ, भाँत भाँत रिझावे । ब्रह्मवासना कोई पारथीं पेखे, सो भी दृष्ट मुरछावे ॥१४॥

इस मनुए को कोई न पेहेचाने, जो तुम सकल मिलो संसार । सब कोई देखे यामें मनुआ, या मनुआ में सब विस्तार ॥१५॥

बोहोत पुकार करूं किस खातिर, ए सब सुपन सरूप । बेहद बनज का होएगा साथी, सो एक लवे होसी टूक टूक ॥१६॥

महामत ए सनमंधे पाइए, ऐसा अखण्ड सुख अपार । गुर प्रसादें नाटक पेख्या, पाया मन मन का प्रकार ॥१७॥

॥ प्रकरण ॥६॥ चौपाई ॥६५॥

इसी सन्दर्भ में देखें-