किरन्तन - प्रकरण ६०
राग श्री गौड़ी
कुली बल देखो रे, ए जो देखन आइयां तुम । खेल किया तुमारी खातिर, सुनियो हो सृष्ट ब्रह्म ॥१॥
अथाह थाह नहीं ऊंचा नीचा, गेहेरा गिरदवाए मोह जल । लोक चौदे खेलें जीव याके, याकी सूझे न याकी कल ॥२॥
सत ढांप्या पीठ देवाई पिया को, झूठ ल्याया नजर । नेहेचल राज सोहाग धनी को, सो भुलाए दियो घर ॥३॥
नेहेचल घर थें आइयां खेल देखने, सत सरूप परवान । सो अंकूरी भूले क्यों यामें, जाए दई पिउ पेहेचान ॥४॥
बिन वाए चढ़या बगरूला, सबको देखे बिन आंखें । खिनमें फिरवले सब लोकों, पाँऊ बिना बिन पांखें ॥५॥
कुली दज्जाल अंधेर सरूपे, त्रिगुन को पाड़े त्रास । सूर सिरोमन साध संग्रामें, पीछे पटक किए निरास ॥६॥
मोह फांस बंध दिए दुनी को, सब अंगो बस आने । राज करे सिर सबन के, चलावत ज्यों जित जाने ॥७॥
प्रथम मूल से बुध फिराई, अहंमेव दियो अंधेर । या बिध इंड रच्यो त्रैलोकी, मूल तें दियो मन फेर ॥८॥
उदयो लोभ विखे रस विखया, सैन्या पति सैतान । दसो दिस आग लगाई दुनियां, सुध बुध खोई सान ॥९॥
बाढ़ी व्याध स्वाद गुन इंद्री, मद चढ़यो मोह अंध । माता बेहेन पुत्री गोरांनी, कासों नहीं सनमंध ॥१०॥
खिन सज्जन खिन दुस्मन, दिवाना दाना प्रवीन । बिध बिध के बंध फंद डार के, सब सूर किए आधीन ॥११॥
ना कछू चोर न कोई साधू, कई डिंभके धरे ध्यान । तान मान सब विद्या व्याकरण, बहुरंगी बहु ग्यान ॥१२॥
वेद कतेब सास्त्र सबे मुख, जुगें लिए सब जीत । मंत्र धात करामात माहीं, पाक उत्तम पलीत ॥१३॥
जिन अंगों मिलिए पिउसों, सो ए दिए उलटाए । फेरी दुहाई वैराट चौखूंटों, कोई सिर न सके उठाए ॥१४॥
चौदे लोक अग्याकारी, सिर सबन के हुकम । या छलने ऐसे उरझाए, आप भूली सुध घर खसम ॥१५॥
केती बिध कहुं कलजुग की, अलेखे अप्रमान । बरना बरन कर मिने व्याप्या, काहुं न किसी की पेहेचान ॥१६॥
छूटी छोले लेहेरें पड़ियां बाहेर, छूट गई मरजाद । भाने भेख पंथ पैंडे दरसन, ढाहे तीरथ प्रासाद ॥१७॥
ग्रास किए त्रिगुन त्रैलोकी, ऐसो मोह अंध अहंकार । सुध न होवे काहूं धाम धनी की, पोहोंचने न देवे पुकार ॥१८॥
पोहोंचे नहीं कल बल कुली को, कोई मिने चौदे भवन । ऐसो महाबली ताए उड़ावें, बुधजी एकै खिन ॥१९॥
चलता पूर लिए दोऊ किनारे, डर धरता बुधजी का । मद चढ़यो करी एकल छत्री, ले बैठा सिर टीका ॥२०॥
बुध जी धनी हुकम मांहें, फरिस्ता असराफील । तिन कान दिए सुनने अग्या को, अब हुकम को नाहीं ढील ॥२१॥
पोहोंची पुकार सुनी धनी श्रवनों, कही कुली की सब गम । कलपे जुथ जान ब्रह्मसृष्ट के, मिले नूर बुध हुकम ॥२२॥
उड़ाए अंधेर किया मिलावा, प्रकास कियो सब अंग । काढ़यो मोह अहंकार मूल थें, जो करता सबन सों जंग ॥२३॥
उदयो अखण्ड सूर निज वतनी, भई जोत कोटान कोट । कहे महामत रात टली सबन को, आए सब धनी की ओट ॥२४॥
॥ प्रकरण ॥६०॥ चौपाई ॥६९१॥
