किरन्तन - प्रकरण ६२ | Kirantan prakaran 62
राग श्री
मांगत हों मेरे दुलहा, मन कर करम वचन । ए जिन तुम खाली करो, मैं अर्ज करूं दुलहिन ॥१॥
मेरे धनी तुमारी साहेबी, तुम अपनी राखो आप । इस्क दीजे मोहे अपनों, मैं तासों करूं मिलाप ॥२॥
ना चाहों मैं बुजरकी, ना चाहों खिताब खुदाए । इस्क दीजे मोहे अपना, मोहे याहीसों मुद्दाए ॥३॥
इलम चातुरी खूबी अंग की, मोहे एही पट लिख्या अंकूर । एही न देवे देखने, मेरे दुलहे के मुख का नूर ॥४॥
एही अंकूर साथ कारने, करत मिलाप अंतराए । न तो एकै आह इन पिया की, देवे सब उड़ाए ॥५॥
एही खूबी मेरे अंग को, देत नाहीं दरद । एही हांसी बुजरकी, करत इस्क को रद ॥६॥
इलम आतम संग बुध के, ए जो आवत जुबांए । फेर श्रवना देवें आतम को, एही परदा नाम खुदाए ॥७॥
ना तो क्यों न उड़े इन आतमा, विचार के एह वचन । इस्क जरे आतम को, इत हो जाए सब अगिन ॥८॥
एही बुजरकी साथ जी, भया गले में तौक । धनी को न देवे देखने, एही खूबी इन लोक ॥९॥
साथ मोको सुख चाहें, जान धाम की प्रीत । मैं परबोधों जान वतनी, मोहे बंधन भयो इन रीत ॥१०॥
वे सेवा करें बहु विध, फेर फेर देवें बड़ाई । हेत करें जान के साहेब, मोहे एही होत अंतराई ॥११॥
मैं भी हेत करत हों इनसों, जान के वतन सगाई । मोहे प्यारा साथ मेरे धनी का, एही पट आड़े आई ॥१२॥
जिन दयाए परदा उड़ाइया, मैं फेर फेर मांगों सो मेहेर । इस्क दीजे मोहे अपना, जासों लगे बुजरकी जेहेर ॥१३॥
मोहे सेवा प्यारी पिउ की, साहेब हो बैठो तुम । अति सुख पाऊं इनमें, करों बंदगी खसम ॥१४॥
बोझ अपनों निज वतन को, सो सब मेरे सिर दियो । नाम सिनगार सोभा सारी, मैं भेख तुमारो लियो ॥१५॥
अल्ला आसिक मासूक महंमद, इस्क दीजे हम । हम आसिक नाम धराए के, मासूक करे हैं तुम ॥१६॥
तुम दुलहा मैं दुलहिनी, और ना जानूं बात । इस्क सों सेवा करूं, सब अंगों साख्यात ॥१७॥
अब तो उमत मिली खासी, और उमत दूसरी । तीसरी भी कायम हुई, अब काहे को ढील करी ॥१८॥
सकल काम भए पूरन, रही ना किसी की सक । महामत चाहे पिउ वतन, आए मिलूं ले इस्क ॥१९॥
प्रेम दरद इस्क तुमारा, मैं फेर फेर मांगूं फेर । प्यारें मिलूं प्यारे पिउसों, प्यारी महामत कहे बेर बेर ॥२०॥
॥ प्रकरण ॥६२॥ चौपाई ॥७३८॥
