किरन्तन - प्रकरण ६३
राग श्री
जिन सुध सेवा की नहीं, ना कछू समझे बात । सो काहे को गिनावे आप साथ में, जिन सुध ना सुपन साख्यात ॥१॥
कमर बांधे देखा देखी, जाने हम भी लगे तिन लार । ले कबीला कांध पर, हंसते चले नर नार ॥२॥
ए लोक राह न पावहीं, क्योंए न सुनें पुकार । ए चले चींटी हार ज्यों, बांधे ऊंट कतार ॥३॥
इन लोकों की मैं क्या कहूं, जो जाए पड़े मुख काल । जो साथ केहेलाए सामिल भए, सो भी कहूं नेक हाल ॥४॥
दूध तो देख्या नहीं, देख्या ऊपर का फैन । दौड़ करें पड़े खैंच में, ए भी लगे दुख देन ॥५॥
लेने को बुजरकियां, सेवें चातुरी चैन । सेवा करत सब खैंच की, ए यों लगे दुख देन ॥६॥
देखा देखी न छूटहीं, सेवत हैं दिन रैन । खुस बखत होवें खैंच में, ए यों लगे दुख देन ॥७॥
क्यों ए न प्रबोधें समझें, कोई आद अमल ऐसा घेन । क्या मूरख क्या समझू, सबे लगे दुख देन ॥८॥
सनमुख होए सेवा करें, मुख बोलत मीठे बैन । तित भी खैंच ऐसी भई, ए भी लगे दुख देन ॥९॥
निपट नजीकी सेवहीं, दौड़े एक दूजे पें लेन । खैंचा खैंच ऐसी करें, ए भी लगे दुख देन ॥१०॥
मन वाचा कर सेवहीं, गलित गात रोवें नैन । तहां भी खैंच छूटी नहीं, ए भी लगे दुख देन ॥११॥
सेवक कई समझावहीं, साखी सबे मुख केहेन । इन भी खैंच छुटी नहीं, ए भी लगे दुख देन ॥१२॥
अर्थ अंदर का लेवहीं, समझें इसारत सेन । खैंच उनकी भी ना गई, वे भी लगे दुख देन ॥१३॥
अंदर बाहेर उजले, दोष देखें सब ऐन । ताए भी खैंच छूटी नहीं, ए भी लगे दुख देन ॥१४॥
तारतम सब समझहीं, धाम सैयां हम बेहेन । तित भी ब्रोध छूटा नहीं, ए भी लगे दुख देन ॥१५॥
ए खेल है इन भांत का, क्यों ए न खुले मूल नैन । निज नजर खुले बिना, कोई न देवे सुख चैन ॥१६॥
राह निपट बारीक है, तिन बारीक पर बारीक । साथें लई लीक जाहेरी, सो उतरी लीक थें लीक ॥१७॥
काहूं न दरवाजा नजीक, कहां कुलफ किल्ली कल गत । राह भी नजरों न आवहीं, ए चले जाहेरी ले मत ॥१८॥
अब कहा कहूं मैं इन पर, कोई ऐसी बनी जो आए । ए जान बूझ तो भूलहीं, जो इनका कछू न बसाए ॥१९॥
राह जुदी दोऊ पेड़ से, तो कहा सके कोई कर। उन आड़ो पट अंतर, इनों बाहेर पड़ी नजर ॥२०॥
न तो सूरे क्यों ना बल करें, कोई बुरा न आपको चाहे । दौड़त है निस वासर, किन पट न टाल्यो जाए ॥२१॥
महामत कहेवें यों कर, हम सैयां दौड़ी धाए । पर ए पट सुंदरबाई बिना, किनहूं न खोल्यो जाए ॥२२॥
बात सुंदरबाई और है, और उनकी और रवेस । गत मत उनकी और है, हम लिया सब उनका भेस ॥२३॥
मोहे सिखापन उनकी, दे फुरमान करी रोसन । इंद्रावती तो केहेवहीं, जो दोऊ बिध करी चेतन ॥२४॥
॥ प्रकरण ॥६३॥ चौपाई ॥७६२॥
