किरन्तन - प्रकरण ६५
राग श्री
ए माया आद अनाद की, चली जात अंधेर । निरगुन सरगुन होए के व्यापक, आए फिरत है फेर ॥१॥
ना पेहेचान प्रकृत की, ना पेहेचान हुकम । ना सुध ठौर नेहेचल की, और ना सुध सरूप ब्रह्म ॥२॥
सुध नाहीं निराकार की, और सुध नाहीं सुंन । सुध ना सरूप काल की, ना सुध भई निरंजन ॥३॥
ना सुध जीव सरूप की, ना सुध जीव वतन । ना सुध मोह तत्व की, जिनथें अहं उतपन ॥४॥
सास्त्रों जीव अमर कहयो, और प्रले चौदे भवन । और प्रले पांचो तत्व, और प्रले कहे त्रिगुन ॥५॥
और प्रले प्रकृत कही, और प्रले सब उतपन । ना सुध ब्रह्म अद्वैत की, ए कबहूं न कही किन ॥६॥
ए त्रिगुन की पैदास जो, सो समझे क्यों कर । त्रिगुन उपजे अहं थें, और हिजाब अहं के पर ॥७॥
ए आद के संसे अबलों, किनहूं न खोले कब । सो साहेब इत आए के, खोल दिए मोहे सब ॥८॥
रूहअल्ला की मेहेर से, उपज्यो एह इलम । और महंमद की मेहेर थें, सुध कहूं माया ब्रह्म ॥९॥
प्रकृती पैदा करे, ऐसे कई इंड आलम । ए ठौर माया ब्रह्म सबलिक, त्रिगुन की परआतम ॥१०॥
कई इंड अछर की नजरों, पल में होय पैदास । ऐसे ही उड़ जात हैं, एकै निमख में नास ॥११॥
केवल ब्रह्म अछरातीत, सत-चित-आनन्द ब्रह्म । ए कहयो मोहे नेहेचेकर, इन आनन्द में हम तुम ॥१२॥
कहे कतेब साहेदी साहेब की, दे न सके कोई और । खुदाए की खुदाए बिना, किन पाया नाहीं ठौर ॥१३॥
ए कतेब यों कहत है, हादी सोई हक । बिना साहेब साहेब वतन की, कोई और न मेटे सक ॥१४॥
संसे मिटाया सतगुरें, साहेब दिया बताए । सो नेहेचल वतन सरूप, या मुख बरन्यो न जाए ॥१५॥
साख पुराई वेद ने, और पूरी साख कतेब । अनुभव करायो आतमा, जो न आवे मिने हिसेब ॥१६॥
हबीब बताया हादिएँ, मेरा ही मुझ पास । कर कुरबांनी अपनी, जाहेर करूं विलास ॥१७॥
तुम देखत मोहे इन इंड में, मैं चौदे तबक से दूर । अंतरगत ब्रह्मांड तें, सदा साहेब के हजूर ॥१८॥
ब्रह्मसृष्टि और ब्रह्म की, है सुध कतेब वेद । सो आप आखिर आए के, अपनो जाहेर कियो सब भेद ॥१९॥
महामत जो रूहें ब्रह्म सृष्ट की, सो सब साहेब के तन । दुनियां करी सब कायम, सही भए महंमद के वचन ॥२०॥
॥ प्रकरण ॥६५॥ चौपाई ॥८०५॥
