किरन्तन - प्रकरण ६६ | Kirantan prakaran 66
सैयां मेरी सुध लीजियो, जो कोई अहेल किताब । तुम ताले लिख्या नूरतजल्ला, सुनके जागो सिताब ॥१॥
ना छूटी सरीयत करम की, ना छूटी तरीकत उपासन । मगज न पावे माएना, चले सब बस परे मन ॥२॥
दोऊ दौड़ करत हैं, हिंदू या मुसलमान । ए जो उरझे बीच में, इनका सुन्य मकान ॥३॥
जोगारंभी या कसबी, पोहोंचे ला मकान । मोह तत्व क्यों ए न छूटहीं, कहया परदा ऊपर आसमान ॥४॥
एक इलम ले दौड़हीं, और ले दौड़े ग्यान । तित बुध न पोहोंचे सब्द, ए भी थके इन मकान ॥५॥
दूजी कुरसी इत तरीकत, जाहेरी ऊपर फुरमान । हकीकत मारफत की, ना किन किया बयान ॥६॥
सो खिताब खोलन का, हुकम हादी पर । जो औलाद आदम हवा की, सो खोले क्यों कर ॥७॥
पातसाह अबलीस दिल पर, सब पर हुआ हुकम । इन दोऊ की अकल सों, कहें खोलें बातून हम ॥८॥
जहां कछुए है नहीं, सब कहें बेचून बेचगून । सुन्य निराकार निरंजन, बेसबी बे निमून ॥९॥
इत खावंद तो न पाइए, बीच आप के ऐब । पीछे कहें हम पाया बातून, हम हीं हैं साहेब ॥१०॥
आतम रूह न चीन्ह हीं, ले माएने इलम ग्यान । आप खुदा हो बैठहीं, ए अबलीसें फूके कान ॥११॥
लोक जिमी आसमान के, तिनके सब्द अकल चित मन । सो आगूं ना चल सके, रहे हवा बीच सुंन ॥१२॥
एह सिपारे दूसरे, या बिध कर लिखे बयान । बीच हवा के पलना, चौदे तबक झुलान ॥१३॥
भूले सब जुदे पड़े, माएना सबों का एक । ए सतगुर हादी बिना, क्यों कर पावे विवेक ॥१४॥
हवा पार महंमद नूर कहया, नूर पार तजल्ला नूर । अर्ज करी वास्ते उमत, पोहोंच के हक हजूर ॥१५॥
नब्बे हजार हरफ कहे, यों कर किया हुकम । तीस हजार जाहेर करो, आखिर बाकी खोलें हम ॥१६॥
सो जाहेरी सब जानत, जो ले खड़े सरीयत । और मुदा बिलंदी गुझ रख्या, सो खोलसी बीच आखिरत ॥१७॥
सोई साहेब आखिर आवसी, किया महंमद सों कौल । भिस्त दरवाजे कायम, सबको देसी खोल ॥१८॥
काजी होए के बैठसी, हिसाब लेसी सबन । पल में प्रले करके, उठाए लेसी ततखिन ॥१९॥
ए सब उमत कारने, आखिर करी सरत । देसी भिस्त सबन को, सो रूहअल्ला की बरकत ॥२०॥
सो हुकम हादी का छोड़ के, छोड़ साहेब के पाए । बीच अंधेरी सुन्य के, जाए जल बिन गोते खाए ॥२१॥
अब पूछो दिल अपना, इत कहां रहया आकीन । मुख से कहें हम महंमद के, कायम खड़े बीच दीन ॥२२॥
ए विचारे क्या करें, सुख ताले लिख्या नाहें । ना तो जान बूझ पढ़े आरिफ, क्यों पड़े दोजख मांहें ॥२३॥
तो आंखां मूंदे कहे, और बेहेरे कहे श्रवण । पढ़े तो पावें नहीं, कुलफ दिलों पर इन ॥२४॥
सो पोहोंची सरत सबन की, हुए वेद कतेब रोसन । ए सदी अग्यारहीं बीच में, होसी दोजख भिस्त सबन ॥२५॥
दिया दोऊ हाथों कर, सिर साहेबें खिताब । महामत खोले सो माएने, आगे अहेल किताब ॥२६॥
ए अहमद अल्ला के हुकमें, महंमद कहया समझाए । अब क्या कहिए तिनको, जो ए सुनके फेर उरझाए ॥२७॥
॥ प्रकरण ॥६६॥ चौपाई ॥८३२॥
