किरन्तन - प्रकरण ६९
सुन्य मण्डल सुध जो जो मारा संमंधी, आ इंडू जेहेने आधार । नेत नेत कही ने निगम वलिया, निगम ने अगम अपार ॥१॥
इहां आद अंत नहीं थावर जंगम, अजवास न कांई अंधार जी । निराकार आकार नहीं, नर न केहेवाय कांई नार जी ॥२॥
नाम न ठाम नहीं गुन निरगुन, पख नहीं परवान जी । आवन गवन नहीं अंग इंद्री, लख न कांई निरमान जी ॥३॥
इहां रूप न रंग नहीं तेज जोत, दिवस न कांई रात जी । भोम न अगिन नहीं जल वाए, न सब्द सोहं आकास जी ॥४॥
इहां रस न धात नहीं कोई तत्व, गिनान नहीं बल गंध जी । फूल न फल नहीं मूल बिरिख, भंग न कांई अभंग जी ॥५॥
अखंड तणां दरवाजा आडी, सुन्य मंडल विस्तार जी । एणें ठेकांणे बेठी अछती, बांधी ने हथियार जी ॥६॥
ए बल जोजो बलवंती नूं, एहनो कोई न काढे पार जी । अनेक उपाय कीधां घणें, पण कोए न पोहोंता दरबार जी ॥७॥
कोई न पोहोंतो इहां लगे, एहनो बोली मारे प्रताप जी । आ पांचो एहनी छाया पड़ी छे, ए सुन्य मंडल विस्तार जी ॥८॥
॥ प्रकरण ॥६९॥ चौपाई ॥८७२॥
