किरन्तन - प्रकरण ७
राग मारू
हो मेरी वासना, तुम चलो अगम के पार । अगम पार अपार पार, तहां है तेरा करार । तूं देख निज दरबार अपनों, सुरत एही संभार ॥१॥
तूं कहा देखे इन खेल में, ए तो पड़यो सब प्रतिबिंब । प्रपंच पांचो तत्व मिल, सब खेलत सुरत के संग ॥२॥
यामें गुनी ग्यानी मुनी महंत, अगम कर कर गावें । सुनें सीखें पढ़ें पंडित, पार कोई न पावें ॥३॥
तूं देख दरसन पंथ पैंडे, करें किव सिध साध । चढ़ी चौदे सुन्य समावें, तहां आड़ी अगम अगाध ॥४॥
ए भरम बाजी रची रामत, बहु विधें संसार । ए जो नैन देखे श्रवन सुने, सब मूल बिना विस्तार ॥५॥
वैराट सब हम देखिया, वैकुंठ विष्णु सेखसांई । सुन्यथें जैसे जल बतासा, सो सुन्य मांझ समाई ॥६॥
ए तूं देख नाटक निमख को, अब करे कहा विचार । पाउ पल में उलंघ ले, ब्रह्मांड सुन्य निराकार ॥७॥
तेरे बीच बाट घाट न तत्व कोई, तूं करे पांउं बिना पंथ । निरंजन के परे न्यारा, तहां है हमारा कंथ ॥८॥
अब पार सुख क्यों प्रकासिए, ए है अपनों विलास । महामत मनसा मिट गई, सब सुपन केरी आस ॥९॥
॥ प्रकरण ॥७॥ चौपाई ॥७४॥
