किरन्तन - प्रकरण ७१
किरंतन आखिर के
राग श्री आसावरी
लाडलियां लाहूत की, जाकी असल चौथे आसमान । बड़ी बड़ाई इन की, जाकी सिफत करें सुभान ॥१॥
सो उतरी अर्स अजीम से, रूहें बारे हजार । साथ सेवक मलायक, पावे दुनियां सब दीदार ॥२॥
मोती कहे जो इन को, जाको मोल न काहूं होए । बारे डाली गिनती, सूरत आदमी सोए ॥३॥
मोमिन बड़े मरातबे, नूर बिलंद से नाजल । इनों काम हाल सब नूर के, अंग इस्कै के भीगल ॥४॥
साल नव सै नब्बे मास नव, हुए रसूल को जब । रूहअल्ला मिसल गाजियों, मोमिन उतरे तब ॥५॥
औलिया लिल्ला दोस्त, जाके हिरदे हक सूरत । बंदगी खुदा और इनकी, बीच नाहीं तफावत ॥६॥
एही गिरो इसलाम की, खड़ियां तले अर्स । या दुनियां या दीन में, सब में इनको जस ॥७॥
लोक जिमी आसमान के, साफ जो करसी सब । बुजरकी इन गिरोह की, ऐसी देखी न सुनी कब ॥८॥
गिरो उठाई अदल से, वास्ते पैगंमरों । देवें ग्वाही आखिर को, ऊपर मुनकरों ॥९॥
करें इमारत भिस्त की, कोसिस सिफत कामिल । देवें खुसखबरी खुदा तिनको, जिनके नेक अमल ॥१०॥
गिरो बनी असराईल, जित महंमद पैगंमर । जिन कौल मकसूद सबन के, सो बीच इन आखिर ॥११॥
मुलक हुआ नबियन का, आखिर हिंदुओं के दरम्यान । गिरो भेख फकीर में, पातसाह महंमद परवान ॥१२॥
माएने रूजू सब इनसें, तौरेत दई है जित । होत पेहेचान खुदाए की, इन गिरो की सोहोबत ॥१३॥
बरसे बयान राह वतनी, कही सूरत मेह इसलाम । गिरे भुने मुरग आसमान से, बनी असराईल पर तमाम ॥१४॥
छे हजार बाजू दोए बगल, जबराईल ऊपर रूहन । अग्यारैं सदी गिरह खोल के, चले महंमद संग मोमिन ॥१५॥
खुदा देवे साहेदी खुदाए की, और ना किनहूं होए । करें बयान फुरमावें हुकम, लायक पूजने के सोए ॥१६॥
अलिफ लाम मीम हरफ ए कहे, ए भेद ना किन समझाए । सो छीले गए कुरान से, ए भेद जानें एक खुदाए ॥१७॥
इत हुज्जत न रही काहू की, तुम देखो एह सुकन । एह खिताब महंमद मेंहेंदी पें, जिन रोसन किए मोमिन ॥१८॥
कुंन के रोज की साहेदी, देवे एही उमत । सो कहे उस बखत की, जो ल्यावे एह हुज्जत ॥१९॥
तौरेत आई नूर बिलंद से, आखिर उमत करी बेसक । भई चिन्हार महंमद मुसाफ, जैसे पेहेचानने का हक ॥२०॥
सब सिफतें एक गिरोह की, लिखी जुदी जुदी जंजीर । कोई पावे न दूजा माएना, बिना महंमद फकीर ॥२१॥
॥ प्रकरण ॥७१॥ चौपाई ॥९०८॥
