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किरन्तन - प्रकरण ७३ | Kirantan prakaran 73

सास्त्रों की प्रनालिका - राग श्री

जो कोई सास्त्र संसार में, निरने कियो आचार । त्रिगुन त्रैलोकी पांच तत्व, ए मोह अहंको विस्तार ॥१॥

निराकार निरंजन सुन्य की, पाई न काल की विध । ना प्रकृत पुरूख की, न मोह अहं की सुध ॥२॥

उपज्या याको केहेवही, कहे प्रले होसी ए । ब्रह्म बतावें याही में, कहे ए सब माया के ॥३॥

उरझे सब याही में, पार सब्द न काढ़े एक । कथ कथ ग्यान जुदे पड़े, द्वैतै में देख देख ॥४॥

किन माया पार न पाइया, किन कहयो न मूल वतन । सरूप न कहयो काहूं ब्रह्म को, कहे उत चले न मन वचन ॥५॥

जो सास्त्रों की प्रनालिका, कहियत हैं विध इन । सो कर देऊं जाहेर, समझो चित चेतन ॥६॥

जो सुख परआतम को, सो आतम न पोहोंचत । जो अनुभव होत है आतमा, सो नाहीं जीव को इत ॥७॥

जो कछू सुख जीव को, सो बुध ना अंतस्करन । सुख अंतस्करन इंद्रियन को, उतर पोहोंचावे मन ॥८॥

जो सुख मन में आवत, सो आवे ना जुबां मों । और जो सुख जुबां से निकसे, सो क्यों पोहोंचे परआतम को ॥९॥

तो कहया तीत सब्द से, जो कछू इत का पोहोंचे नाहें । असत ना मिले सत को, ऐसा लिख्या सास्त्रों मांहें ॥१०॥

जो कछू पिंड ब्रह्मांड की, सब फना कही सास्त्रन । अखंड के पार जो अखंड, तहां क्यों पोहोंचे झूठ सुपन ॥११॥

पंडित पढ़े सब इत थके, उत चले ना सब्द बुध मन । निरंजन के पार के पार, पोहोंचाऊं याही सास्त्रन ॥१२॥

मेरा अंग पांच तत्व का, इन अंतस्करन विचार । केहेनी लीला अछरातीत की, जो परआतम के पार ॥१३॥

ए देह मेरी हद की, इसी देह की अकल । धाम धनी सुख बरनन, केहेने चाहे असल ॥१४॥

आतम मेरी हद में, जीव कहे बुधें उतर । बुध मन पें कहावे जुबान सों, सो जुबां कहे क्यों कर ॥१५॥

असलें आतम न पाहोंचही, क्यों पोहोंचे जीव ग्यान । जो मन देत जुबांन को, सो जुबां करत बयान ॥१६॥

मैं बैठ सुपन की सृष्ट में, बोलूं इन जुबांन । जीव सृष्ट क्यों मानहीं, तो भी कर देऊँ नेक पेहेचान ॥१७॥

आतम रोग मिटावने, ए सुख कहों मांहें सब्द । बेहद के पार के पार सुख, सो नेक बताऊं मांहें हद ॥१८॥

मेरे केहेना ब्रह्मसृष्ट को, इन मन जुबां माफक । झूठी जिमिएँ याही सास्त्रन सों, जाहेर कर देऊं हक ॥१९॥

साथ मेरा ब्रह्मसृष्ट का, तिन हिरदे साफ करन । सो निरमल क्यों होवहीं, धाम अखंड देखाए बिन ॥२०॥

सो हिरदे साफ हुए बिना, क्यों कर पोहोंचे धाम । हम भेजे आए धनी के, एही हमारा काम ॥२१॥

सास्त्रों तीनों सृष्ट कही, जीव ईश्वरी ब्रह्म । तिनके ठौर जुदे जुदे, ए देखियो अनुकरम ॥२२॥

जीव सृष्ट बैकुंठ लों, सृष्ट ईश्वरी अछर । ब्रह्मसृष्ट अछरातीत लों, कहे सास्त्र यों कर ॥२३॥

जो सृष्ट आई जिन ठौर से, घर पोहोंचे आप अपनी । पार दरवाजे खोल के, आखिर पोहोंचे कर करनी ॥२४॥

आप अपने वतन पोहोंचते, अटकाव न होवे किन । जो जहां से आइया, धनी तहां पोहोंचावे तिन ॥२५॥

जिन जानो सास्त्रों में नहीं, है सास्त्रों में सब कुछ । पर जीव सृष्ट क्यों पावहीं, जिनकी अकल है तुच्छ ॥२६॥

लोक जिमी आसमान के, ए सुपन की अकल । सो पांच तत्व को छोड़ के, आगे न सकें चल ॥२७॥

जो सुध आचारजों नहीं, सो जीवों नहीं बरतत । जाग्रत बुध ब्रह्मसृष्ट में, लिख्या जाहेर होसी आखिरत ॥२८॥

ऐसा सास्त्रों में लिख्या, ब्रह्म ब्रह्मसृष्टी सों । इत आए करसी अदल, दे दीदार सब को ॥२९॥

ब्रह्मसृष्टि धाम पोहोंचावसी, और मुक्त देसी सबन । कलजुग असुराई मेट के, पार पोहोंचावसी त्रिगुन ॥३०॥

और भी साख नीके देऊँ, कर देखो विचार । आखिर अथर्वन वेद पर, सब सृष्टों का मुद्दार ॥३१॥

तीनों वेदों ने यों कहया, वेद अथर्वन सबको सार । ए वेद कुली में आखिर, त्रिगुन को उतारे पार ॥३२॥

ऐसा जाहेर कर लिख्या, पर जिनको नहीं आकीन । सो कैसे कर मानहीं, जिनकी मत मलीन ॥३३॥

कहे रसूल खुदा मैं देखिया, और ले आया फुरमान । कौल किया आखिर आवने, दीदार होसी सब जहान ॥३४॥

लिख्या है फुरमान में, खुदा काजी होसी आखिर । जरे जरे हिसाब लेय के, पोहोंचावे किसमत कर ॥३५॥

मोमिन मुतकी वास्ते, इत आवसी खुदाए । भिस्त देसी सबन को, लिख्या है इप्तदाए ॥३६॥

सो समया सरतें सब लिखीं, बीच अथर्वन । कहावें पढ़े महंमद के, पर पावें ना आकीन बिन ॥३७॥

रब एक राह चलावसी, देकर अपना इलम । करसी कायम सबन को, अपना चलाए हुकम ॥३८॥

सरीयत सो माने नहीं, खुदा बेचून बेचगून । कहे खुदाए की सूरत नहीं, बेसबी बेनिमून ॥३९॥

कहे आकीन महंमद पर, ऊपर कयामत और फुरमान । और कहया न माने महंमद का, बड़ा देख्या ए ईमान ॥४०॥

नास्तिक कर बैठे हते, देख वेद कतेब के मांहें । पांच तत्व त्रिगुन बिना, कहे और कछुए नाहें ॥४१॥

और कहे नासूत मलकूत, और तिन पर ला-मकान । पढ़ के वेद कतेब को, करत माएने एह निदान ॥४२॥

न तो ए सब्द सास्त्रों के, हुती सबों को सुध । तो भी पकड़े ला मकान सुन्य को, ऐसी जीवों नास्तिक बुध ॥४३॥

अब जाहेर हुई सृष्ट ब्रह्म की, और जाहेर वतन ब्रह्म । अर्स उमत जाहेर हुई, हुई जाहेर सूरत खसम ॥४४॥

खेल देखाया ब्रह्मसृष्ट को, करके हुकम आप । ए झूठा खेल कायम किया, करके इत मिलाप ॥४५॥

महामत कहे ब्रह्मसृष्ट को, ऐसा हुआ न होसी कब । गुझ सब जाहेर किया, ए जो लीला जाहेर हुई अब ॥४६॥

॥ प्रकरण ॥७३॥ चौपाई ॥९५९॥

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